सास-बहू (लघुकथा)

सास-बहू (लघुकथा)

आरती बहू जरा चाय बनाना साथ में पकौड़े भी।पड़ोस के मि.मेहता साहब आये हैं बड़े ही सुलझे हुए और समझदार इंसान हैंऔर ये पर्दा करने की कोई जरूरत नहीं है।

अभी आई मम्मीं जी , अपने बेडरूम से बाहर निकलते हुए आरती मधुर स्वर में बोली।मानों बागों में कोयल कूक रही हो।मम्मीं जी चाय -पकौड़े तैयार है ,क्या मैं लेकर आऊँ?
हाँ-हाँ बहू ,पूछना क्या है?
अंकल हैं,उनसे कैसी लज्जा ?

मि.मेहता का चरण -स्पर्श कर आरती धीरे से अपने रूम में चली गई।आरती मन-ही -मन सोच रही थी न जानें क्यों ?बेबजह ही लोग सास से चिढ़ते हैं ससुराल के बारे में पहले से ही गलत धारणा मन में बना लेते हैं।

”आरती बेटा, तुम मेरी बहू नहीं बेटी हो।”अभी तुम्हारी शादी को तो बस एक ही माह हुए हैं और तुमने भान ही नहीं होने दिया कि मैं तेरी सास हूँ।जी, मम्मीं जी!मम्मीं जी नहीं सिर्फ मम्मीं………..।ओके

हैलो ,आरती बेटा कैसी हो ससुराल में सब ठीक तो है।प्रणाम मम्मीं ,मैं ठीक हूँ आप कैसी हैं ?अपना ख्याल रखियेगा और पापा ,गोलू ,सोनू सब ठीक है ना।हाँ मेरी प्यारी गुड़िया ,सब लोग अच्छे हैं।मुझे तो बस तेरी चिंता हो रही है।न जाने ससुराल वाले तेरे साथ कैसा व्यवहार करते हैं?तुम तो हमेशा ठीक ही बोलती हो परंतु मैं माँ हूँ ना दिल घबरा जाता है।सास कभी माँ …………..।
मम्मीं आप भी वही पुरानी दकियानुसी बातों के पीछे पड़ी रहती हैं।ठीक है मम्मीं ,प्रणाम!

बेटा आरती,आज शाम मेहता जी के घर बर्थडे पार्टी है सबको बुलाया ।जड़ी वाली सूट पहन लेना ।हमलोगों खूब मस्ती करेंगे ।मम्मीं ,मैं अभी आई !

आइए-आइए भाभीजी, बहू को भी लाईं हैं ।नमस्ते अंकल,नमस्ते आंटी!खुश रहो आरती बहू।भाई ये मेरी बहू नहीं बेटी है।बहुत संस्कारी और शांत स्वभाव की है ।

सास की बात आरती बड़े गौर से सुन रही थी और मन-ही-मन सोच रही थी ,क्या यही सास की परिभाषा है?या कुछ और………………।

सरस्वती कुमारी
ईटानगर (अरूणाचल प्रदेश )।

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