मुक्तक · Reading time: 1 minute

सावन-भादो

सावन भादो तुम जरा ,बरसो दिल के गाँव
तपन जरा इसकी हरो , बादल की दो छाँव
अश्कों ने बहकर हरे, थोड़े दिल के दर्द
तुम भी आ खेलो जरा , खुशियों के कुछ दाँव

डॉ अर्चना गुप्ता

5 Comments · 184 Views
Like
1k Posts · 1.3L Views
You may also like:
Loading...