कविता · Reading time: 1 minute

सावन फिर आया झूम के

*सावन फिर आया झूम के*
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ना जाने कितने सावन आए
हर सावन में सपने सजाए
बीते सावन बिखरे अरमान
नहीं आए दिल के मेहमान
जैसे सावन में बारिश बरसे
टप टप नयनों से अश्रु बरसे
सूखी आँखें खत्म हैं आँसू
आज भी नैन दर्शन पिपासु
विरह वेदना बहुत है सताए
साजन कहीं नजर न आए
नभ में जब होती है गर्जन
तन मन में उठती हैंं सिरहन
काले मेघ उमड़ उमड़ छाये
वियोगिनी का दिल घबराये
अंगप्रत्यंग प्रत्यंचा चढ़ जाएं
तपती देह में आग लग जाए
सौंधी सौंधी खुशबू है आये
बैरी पिया को जल्दी बुलाये
सखियाँ सावन के झूले झूलें
अतृप्त मन प्रेम पीड़ा झेले
जाएंगें कब संसारिक झमेले
लगेंगे जब नेह मधुरिम मेले
सावन फिर आया झूम के
अरमान जागें फिर हुजूर के
आ जाओ सुखविंद्र मनमीत
सावन में होगी स्नेहिल जीत
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सुखविंद्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली ( कैथल)

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Author
सुखविंद्र सिंह मनसीरत कार्यरत ःःअंग्रेजी प्रवक्ता, हरियाणा शिक्षा विभाग शैक्षिक योग्यता ःःःःM.A.English,B.Ed व्यवसाय ःःअध्ययन अध्यापन अध्यापक शौक ःःकविता लिखना,पढना भाषा ःःहिंदी अंग्रेजी पंजाबी हिन्दी साहित्यपीडिया साईट पर प्रथम रहना प्रतिलिपि…
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