साल जाते हैं, तो आते भी हैं ।

साल जाते हैं, तो आते भी हैं ।
ग़र ये रोते हैं, तो गाते भी हैं ।।
ग़म के सागर में डुबोया इनने,
किन्तु अपने हैं, तो भाते भी हैं ।।
वक्त में कुछ खटाई-सी भरके,
अह़सास-ए-ज़िंदगी कराते भी हैं।
लेके जाते हैं ग़र ख़ुशियाँ सारीं ,
तो ये सौगात नई , लाते भी हैं ।।
झूमकर गा उठें, भँवरे जिनपर ,
बाग-ए-ग़ुल ऐंसा खिलाते भी हैं ।।
ग़म-ए-दरिया में तैरकर ,यारो !
किश्ती साहिल पै ये लाते भी हैं ।।
ये ग़ुजरते हैं, ग़ुजरेंगे हमारे जैसे,
ले के जाते है , तो लाते भी हैं ।
इनमें रहना है और रहना होगा ,
साल-दर-साल ये, आते भी हैं ।

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-ईश्वर दयाल गोस्वामी कवि एवं शिक्षक , भागवत कथा वाचक जन्म-तिथि - 05 - 02...
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