कविता · Reading time: 1 minute

सालों बाद वह गाँव

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सालों बाद वह गाँव लौटेगा।
उन पगडंडियों को खोजेगा।
कितने! सधे कदम होते थे उसपर।
उसे स्कूल और हाट-बाजार ले जाता था।
नंगे पैरों से घिस-घिस खेत से बना था पथ।
अब सोचने से सिहरता है देह,आई(माँ) शपथ।

उस पोखर को ढूंढेगा
जो उसे हर छलांग पर देता था उपर उछाल।
मछलियों को पकड़ने का सुख क्या था कमाल!

पीपल के उस वृक्ष को पहचानने की करेगा कोशिश।
उमस से उफनती गर्मी से बचने इकट्ठा होते लोगों में
ढूंढेगा अपने दोस्त की अनसुलझी ख़्वाहिश।

आम के पेड़ की ऊंचाइयों में निशाना लगाते ढेलों को
एक बार फिर से उठाकर किसी आम पर फेंकेगा।
निशाना लग जाए तो खुश हो सच, चीख सकेगा?

भोर में अलसाए–अलसाए उठने को और
गोधूली वेला में भूत के भय को याद करेगा।
वह अब अकेले खुद से हर सारा संवाद करेगा।

सावन के महीनों में खेत और अगहन के
खलिहान को जीने लालायित होगा।
सब बदल चुका होगा
गाँव के घर और गलियाँ भी।

काका,काकी,भैया,दीदी के सारे सम्बोधन
उसके लिए खो चुका होगा।
उसे जानने वाला हर चेहरा
विलुप्त हो चुका होगा।

नदियाँ जो घेरकर बहती थी गाँव को
जरूर सूख चुकी होंगी।
इनके जल-ग्रहण क्षेत्रों को अवश्य ही
आबादी का ग्रहण लग चुकी होंगी।

खग-विहग सुबह-सुबह पता नहीं
उतरती होंगी छत,मुडेर,आँगन में या नहीं?
और अस्त होते सूरज के साथ पता नहीं
घोंसले को लौटते हुए कलरव करती होंगी या नहीं।

लौटकर दुखित क्यों हो
इसलिए वह नहीं लौटेगा।
———————–14sept21——————————-

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