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साया

हरे-भरे इक पेड़ से मिलती,
हमको शीतल छाया है l
लगता ऐसा, सर पर अपने,
बाबूजी का साया है l
हरे-भरे इक पेड़ से मिलती …l

भोर भयो, पातों का गुंजन,
दे जाता है मीठे गान l
मानो बापू सुना रहे हों,
भजन सुरीला लेकर तान l
मुस्काते हरियाले पन में,
उनका रूप समाया है l
लगता ऐसा, सर पर अपने,
बाबूजी का साया है l
हरे-भरे इक पेड़ से मिलती …l

कभी-कभी नोकीले गाँठे,
चुभन सजीली बाँट रहे l
मानो बच्चों की गलती पर,
बापू उनको डाँट रहे l
आँधी, बारिश और तपन से,
इसने हमें बचाया है l
लगता ऐसा, सर पर अपने,
बाबूजी का साया है l
हरे-भरे इक पेड़ से मिलती …l

यह जीवन नश्वर है प्यारे,
ऐसा भी दिन आएगा l
जब यह छाया देता-देता,
गोद धरा की पाएगा l
यही सोच इक नन्हा पौधा,
घर में आज लगाया है l
लगता ऐसा, सर पर अपने,
बाबूजी का साया है l

हरे-भरे इक पेड़ से मिलती,
हमको शीतल छाया है l

(मेरी उपरोक्त रचना,’दैनिक जागरण’ के वृक्षारोपण परिशिष्ट में भी हाल ही में प्रकाशित हो चुकी है)

– राजीव ‘प्रखर’
मुरादाबाद (उ. प्र.)
मो. 8941912642

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