सामान समझते है

उन्हें देख मजबूरी मै मुश्कुरते हैं लोग,
वो उसे ही अपना सम्मान समझते हैं।
औरों की मजबूरी का उडाते है मजाक,
ऊँची बातें करना अपनी शान समझते हैं।
इंसानों वाली कोइ बात नहीं उन मै ,
फिर भी खुद को वो भगवान समझते है।
कुछ लोग यूंही उनका नाम ले लेते है,
बस उसी को अपनी पहचान समझते है।
चंद लोग उनकी तारीफ करते होंगें,
उन्हीं की महफ़िल को सारा जहान समझते है।
लानत ऐंसे लोगोपे जो अपनी बेटी को बेटी,
और दूसरों की बेटियों को सामान समझते हैं।
रचनाकार÷ जितेंद्र दीक्षित
पडाव मंदिर साईंखेड़ा

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