सामयिक ,,,,,सायकिल छाप दोहे

सायकिल छाप दोहे

आज आदरणीय परम,रूठ गए हैं आप
लायक अपने पूत से ,रूठा करता बाप
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आहत मन से देखते ,कुछ अनबन कुछ मेल
सायकल की अब मान घटी ,पटरी उतरी रेल
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बेटा करता बाप से ,विनती और गुहार
दिलवा दो अब सायकिल ,पंचर दियो सुधार
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लिखने वाले लिख रहे ,तरह तरह आलेख
सबके अपने मन-गणित,अलग-अलग उल्लेख
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विकसित होते राज में,है विकास की गूंज
एक दूजे टांग पकड़,तंदूर वहीं भूंज
सुशील यादव
८.१.१७

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