कविता · Reading time: 1 minute

सामने न सही

सामने न सही चिलमन के पीछे से
सूरत न सही घूँघट के ओट से ही
किसी भी हालात में हो फ़िर भी
बेचैन हैं हम तेरे दीदार को वर्षो से

माना कुछ रिवाज ने रोक रखा
लेकिन जब पाँव बाहर निकालना
एक बार बैठ के सोच लेना मुझे
और पाँव मोड़ लेना मेरे घर तरफ़

मेरा दर तेरे पाँव के इंतजार में हैं
यकीं न हो तो मिट्टी से पूछ सकते
हवा,भी साँस लेता तेरे नाम का
ताज्जुब इसमें कुछ नया नहीं है
📝 रवि कुमार सैनी

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