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सादी है नून रोटी सांचे हैं मिटटी के

ग़ज़लों में सांस लेते अरमान ज़िन्दगी के
सादी है नून रोटी सांचे हैं मिटटी के

मिट्टी के फर्श पर है उम्मीद की दीवारें
ज़ख़्मी ये बदली है घुस छत में झोपड़ी के

एक बूँद चाह भर कर उतरी कि हैं दरारें
इस ईंट के ढेरों पर छप्पर हैं दिहाड़ी के

चाहत पे अटकते है तेरी झलक देख कर
हर रोज़ की दौलत हैं ये शेर बेबसी के

मुराद कर रहे हैं कुछ साल मुफलिसी में
उम्मीद हमसे रखते सवाल ज़िन्दगी के

मेरा बेनाम चेहरा औ लाख सरज़मी पे
हर रोज़ सजदा करते माटी पे इस ज़मी के

~ सूफी बेनाम

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Anand Khatri
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आनन्द खत्री (सूफी बेनाम ) (निवासी : नोएडा ) जन्म : २२ फरवरी १९७१ ,... View full profile
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