साथ तेरा

तूने जो छुया मेरे अधरों को
छुईमुई बन बिखर गई
चमकी जो नभ में बिजुरी
देख कर सहम गई ।

स्पर्श था तेरे हाथों का
सिंहरन बन कर सिहर गई
आलम्बन तू मेरा बना है
उद्दीपक मैं प्रिय बन गई ।

साँसों के झूले रफ्तार पकड़ते
पर मैं हिल डुल न सकी
बंधन तेरा कस्तूरी जैसा था
अपने को मुक्त कर न सकी ।

विश्वासों के घेरे में रहकर
पग से पग मिला चलती रही
राह का बन कर रहवर
नेक पथ तुझको चलाती रही ।

पीड़ा मेरी विश्व व्यापिनी बनी
पर सबकी पीड़ा हरती रही
मूरति ममता और नेह की मैं
स्रोत स्नेह का लुटाती रही ।

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डॉ मधु त्रिवेदी शान्ति निकेतन कालेज आफ बिजनेस मैनेजमेंट एण्ड कम्प्यूटर साइंस आगरा प्राचार्या, पोस्ट...
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