कविता · Reading time: 2 minutes

#सांग – सारंगापरी # अनुक्रमांक-4 # एक साधू रमता राम सै, लिया भगमा बाणा माई।। टेक ।।

एक साधू रमता राम सै, लिया भगमा बाणा माई।। टेक ।।

साधू की 18 सिद्धी, पहली सिद्धी सत्यबाणी,
दूसरे कै मन की बात जाणूं, तीन लोक की खबर मंगाणी,
भूत, भविष्य, वर्तमान, तीन काल की जाती जाणी,
सातवी सिद्धी सत पै रहणा, आठ योग, नौ नाथ विज्ञानी,
दसवें द्वारै जीव चल्या जा, तुर्यापद अटल समाधी लाणी,
लौ तै लौ लगै ईश्वर मै, फिरै घूमता भवंर सैलानी,
ॐ भूर्भवः महालोक, ब्रहम रूप होए अंतरज्ञानी,
परमजोत कुदरत से मिलज्या, मोहमाया से मुक्त प्राणी,
आत्मा.परमात्मा कहै सै, मुनि-महात्मा ज्ञानी-ध्यानी,
आवागमन छुटै चैरासी आवै कोन्या मौत निमाणी,
सतलोक परम का धाम सै, ना जाके आणा माई।।

मै उस धूणै का साधू, जिसकी भारी जोग-जमात,
चौसठ जोग-जोगनी, तैतीसो चेले, सेवक दिन-रात,
आठ पंथ, नो नाथ, चौरासी का रखवाला गोरखनाथ,
पंचमगर, कनपाड़े साधू, जादूपंथी, औघड़नाथ,
झाड़े-मंत्र सेवन-विद्या, ब्होत जाणूं करामात,
मन चाहवै जिसा भोजन जीमूं, चाहूँ जिसा बणाल्यूं गात,
राजा नै कंगाल बणादूं, कंगले कै होज्या धन-जादात,
मौज उड़ावै लाल खिलावै, बांझ बणै बेटे की मात,
आपस कै म्हा बैर-दुश्मनी जिसकी चालै पीढी सात,
उन माणसा की एक घड़ी म्य, मै करवादूं मुलाकात,
मेरै धनमाया किस काम सै, मनै मांगके खाणा माई।।

वेनजुएला, अल्जीरीया, बेल्जियम, मोरी, सूडान,
न्यूजीलैंड, थाईलैंड, नाईजीरियां, पेरिस, लंदन, तालिबान,
बैलग्रेड, युगोस्लाविया, मलेशिया, दुबई, बहरान,
हांगकांग, फ्रांस, इटली, लंका, आस्ट्रेलिया, रजान,
सिंध, काबुल, कंधार, ऐशिया, अरबदेश, ईराक, ईरान,
रूमशाम, इंग्लैड, शाहजहां, बर्मा और बिलोचिस्तान,
ग्रीक, हंगरी, अमरीका, रूस, चीन और जर्मन, जापान,
मैगजीन, भोनसी, पराना, ऑल इंडिया, पाकिस्तान,
आईसलैंड, पनामा, पेरू, ताशकंद, उज्बेकिस्तान,
रोमानियां, वियतनाम, सिंगापुर, मक्का, ताईवान,
देख्या मनै ओमान सै, यो घूम जमाना माई।।

गंगा-जमना 68 तीर्थ, देख लिए मनै चारों धाम,
गऊमुखी, बन्द्रीनारायण, पिरागराज, त्रिवेणी नाम,
सरवण नदी, गौतमी, गंगा, गोदावरी पै डटे सिया-राम,
ऋषिकेष, हरिद्वार, अयोध्या, गौकुल-मथुरा मै कन्हैया-श्याम,
रामेश्वर, केदारनाथ, गंगोत्री, गयाजी विश्राम,
सोमनाथ, जगन्नाथपुरी, बैजनाथ, बिहार, आसाम,
पुष्कर, विश्कर्मा, ब्रहमपुत्र, त्रिवेन्द्र, फलगू रस्ता आम,
चक्षु-भद्रा, सीया-नंदा नर्मदा-तप्ती पै, रथ सूर्य नै लिया थाम,
कृष्णा, कावेरी, पुनमही, पोषणी मै, न्हावै देश तमाम,
ब्राहमण जात प्रेम का बासी, कवि सुण्या हो राजेराम,
खास लुहारी गाम सै, मेरा ठोड़-ठिकाणा माई।।

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Author
संकलनकर्ता :- संदीप शर्मा ( जाटू लोहारी, बवानी खेड़ा, भिवानी-हरियाणा ) सम्पर्क न.:- +91-8818000892 / 7096100892 रचनाकार - लोककवि पंडित राजेराम भारद्वाज संगीताचार्य जो सूर्यकवि श्री पंडित लख्मीचंद जी प्रणाली…
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