सही समय की पहचान ही बदलाव का नया रास्ता

समय की पहचान आज के युग में बहुत बड़ी आवश्यकता बन गयी है जो समय के साथ नही चला वह पीछे ही नहीं विकास की मुख्य धारा से भी कट जाएगा , क्योंकि परिवर्तन ही जिंदगी का दूसरा रूप है जब तक बदलाव नही होगा प्रगति सम्भव नही। तालाब का ठहरा पानी धीरे धीरे खराब हो जाता है जबकि वही पानी नदी में स्वच्छ रहता है यह उसके बहते रहने के कारण संभव है बदलाव के कारण सम्भव है ।

उदाहरण के रूप में हम कह सकते है एक चट्टान जो कितनी दृढ़ होती है आसानी से हम उसे नही तोड़ सकते । उसी चट्टान को पानी धीरे धीरे घिसकर कोमल मिट्टी में परिवर्तित कर देता है जबकि पानी का स्वभाव कितना कोमल होता है लेकिन उसका यही स्वभाव चट्टान को टूटने पर मजबूर कर देता है । हमे अपना स्वभाव पानी की तरह बनाना चाहिए ,जो अपना रास्ता खुद निकाल ले ।अगर रस्ते में रुकावटें आये तो भी हम रुके नहीं पानी की तरह इधर उधर कहीं न कहीं रास्ता खोजने का प्रयास करें । क्योंकि अगर पानी को कोई ज्यादा मात्रा में रोकने की कोशिश करता है तो फिर बांध टूटकर बढ़ आना निश्चित है ठीक उसी प्रकार अगर हमारा प्रयास काफी मात्रा में होगा तो एक दिन सफलता भी बाढ़ के रूप में मिलना निश्चित है

जिंदगी ईश्वर का दिया हुआ एक अनमोल तोहफा है जो बहुत ही पुण्य कर्मों के बाद हमें मिला है जिस प्रकार हम अपनी अगली पीढ़ी के लिए धन से लेकर सुख सुविधओं की हर वस्तु इकट्ठा करने में पूरा जीवन गुजार देते है उसी प्रकार अपने अगले जन्म के लिए भी कुछ न कुछ अर्जन करना आवश्यक है और वह हम केवल किसी मंदिर या मस्जिद में बैठकर ही नहीं कर सकते समाज मे ब्याप्त बुराइयों के खिलाफ अपना सहयोग देकर,असहाय और निरीह प्राणियों की सहायता करके भी कर सकते हैं । इसके लिए समय की पहचान बहुत ही आवश्यक है समाज की हर स्थिति पर हमारी कड़ी नजर जरूरी है । एक जागरूक नागरिक की हैसियत से या फिर मानवता की हैसियत से दोनो स्तर पर हमें अकेले ही शुरू करें चाहिए समाज तो पीछे पीछे चलने वालों की भीड़ होता है उसे एक लीडर चाहिए ,क्षमताओं की कमी नही है बस जरूरत है उसकी पहचान की जिसने उस क्षमता को पहचान लिया उसी का जीवन सार्थक हो जाता है

मनुष्य सदैव अपने कर्मो के लिए पहचाना और याद किया जाता है , कर्म ही उसे अमरत्व प्रदान करते है हमे किसी की तरह न बनकर अपना अलग रास्ता चुनना चाहिए वह रास्ता निर्माण का, रचना का , प्रगति का ,नई क्षमता का ,नए सृजन का होना चाहिए जिससे समाज मे कुछ बदलाव आ सके । आज के समाज मे देखे तो हर आदमी जाति के नाम पर धर्म के नाम पर सम्प्रदाय के नाम पर जान देने और जान लेने के लिए आतुर है क्या यही धर्म है क्या यही धर्म के प्रति आस्था दिखाने का तरीका है धर्म के नाम पर लूट चोरी यह सब एक दूसरे के पर्याय बन गए । इन सबसे ऊपर उठकर एक नए समान एक नए धर्म की स्थापना के लिए हमे सहयोग देना होगा। एक ऐसा धर्म स्थापित करना होगा जिसमें बंटवारे की कोई जगह ही न हो सब एक मानव धर्म से जुड़ जाए सभी के सहयोग से सभी के लिए एक आदर्श समाज की स्थापना हो। हम अपने आत्मबल को इतना प्रबल बनाए कि किसी संबल की आवश्यकता ही न हो स्वयं को इतना प्रसारित का दे कि समक्ष ब्यक्ति हमारे आदर्शो को आत्मसात करने के लिए स्वयं को रोक ही न पाए और यह सब करने के लिए समय की पहचान बहुत ही आवश्यक है ।

अमित मिश्र
शिक्षक
जवाहर नवोदय विद्यालय शिलांग मेघालय

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