.
Skip to content

‘सहज के दोहे

DrMishr Sahaj

DrMishr Sahaj

दोहे

February 9, 2017

अन्दर से बेशक हुआ, बिखरा – चकनाचूर.
चेहरे पर कम ना हुआ,पर पहला सा नूर.
‘सहज’ प्रेम से वास्ता,नफरत का क्या काम.
यहीं धरा रह जायगा,काला – गोरा चाम.
प्यार सदा देता ‘सहज’,बिन माँगे आनंद.
रह चाहे बाचाल या, रह बोली में मंद.
दुर्दिन में भी यदि रहे,तू अविचल निष्काम.
बना रहेगा हर समय, इक जैसा ही नाम.
@डॉ.रघुनाथ मिश्र ‘सहज’
अधिवक्ता/साहित्यकार
सर्वाधिकार सुरक्षित

Author
DrMishr Sahaj
Recommended Posts
'सहज' के दोहे -खामोशी
खामोशी पसरी रही,लोग रहे भयभीत। दूर-दूर तक मौन थे,छन्द-ग़ज़ल औ गीत। हम जब तक खामोश थे,खूब चल गई पोल। ठान लिया अब बोलना,होगा डब्बा गोल।... Read more
डॉ.रघुनाथ मिश्र 'सहज' की तेवरी
तेवरी काव्य डॉ.रघुनाथ मिश्र ‘सहज’ की तेवरी : 000 हमने सब कुछ हारा मितवा. जग ने जैम कर मारा मितवा. घूम-घूम कर दुनिया देखि, घर... Read more
जिसमें सुर-लय-ताल है
जिसमें सुर-लय-ताल है, कुण्डलिया वह छंद  सबसे सहज-सरल यही, छह चरणों का बंद  छह चरणों का बंद, शुरू दोहे से होता  रौला का फिर रूप,... Read more
भूल जाओ किसका आना रह गया
क्या बताऊँ? क्या बताना रह गया सोचता बस यह, ज़माना रह गया क्या यही चारागरी है चारागर! जख़्म जो था, वो पुराना...! रह गया लोग... Read more