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सशक्त बेटियाँ

jyoti singh

jyoti singh

कविता

January 22, 2017

बहुत जी लिए दूसरों की खातिर
अब खुद के लिए जीना होगा।
बहुत जी लिए बनकर –
किसी की बेटी ,किसी की बहन,
किसी की पत्नी,किसी की माँ,.
अब तो मनुष्य बनकर ही,
जीवन बिताना होगा ।
स्वयं ही गढ़ना है अपना व्याक्तित्व,
अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से,
कर देना है मजबूर, जानने समझने को,
अपने सुदृढ़ इतिहास और वर्तमान को।।
त्याग की मूर्ति करूणामयी सीता,
नहीं थीं सिर्फ जग जननी,
वह भी कभी थी बाल स्वरूपा,
फिर क्यों सिर्फ बालकाण्ड में
राम गुण गाया जाता ?
हमारा भी होता है बचपन,
फिर क्यों बालिकाओं की अठ्खेलियाँ को,
नहीं सींचा जाता है बाल रस से?
क्या हम बनी हैं सिर्फ
श्रृंगार रस में भिगोने के लिए?
नहीं थी कैकेयी सिर्फ कुमाता,
वह भी कभी रण- भूमि में,
सारथी बन ,दशरथ की नईया तारी थी।।
बहुत बन चुके नींव की ईंट,
अब तो छप्पर बन दिखाना होगा।
मनु स्मृति पढ़ने के साथ,
अब सत् रूपा स्मृति रचना होगा।।
नहीं जानते सुषमा के जनक व जननी केा,
पर,बन विदेश मंत्री ,विश्व में परचम लहराती है।
किरण वेदी है किसकी पत्नी,
यह बतलाना है जरा मुश्किल,
फिर भी अपने दम पर
रचा है स्वर्णिम इतिहास।।
गीता बबीता हरियाणा में ही नहीं,
पूरे विश्व में अपनी शाक्ति दिखाती हैं।
फिर क्यों नहीं बेटियों को बचाकर
हरियाणा को अभिश्राप मुक्त बनाती हैं।
बहुत जी लिए दसरों के दम पर,
अब खुद का वज़ुद बनाना है,
बचा खुचा खाने से अच्छा,
खुद का भोजन बनाना है।
हम कोई मामूली चीज नहीं हैं,
हमें अपने को अमूल्य निधि बनाना है।
बहुत जी लिए दूसरों की खातिर
अब खुद के लिए जीवन बीताना होगा।।

Author
jyoti singh
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