सर्वोपरि देश या कुर्सी

आज देश में 2019 के लोकसभा के चुनाव में राजनेताओं एवं राजनीतिक पार्टियों ने यह साबित कर दिया है कि हम सत्ता के लिए कुछ भी कर सकते हैं।

एक तरफ सत्ता पक्ष जहां देश के भविष्य के बारे में सोच रही है, हिंदुस्तान को वैभव शक्तिशाली राष्ट्र बनाना चाह रही है, खोई हुई अपनी संस्कृति और सभ्यता को उभार रही है, फिर से विश्व गुरु बनने की सपना देख रही है, 1948 में हुई गलती को सुधारने के लिए धारा 370 एवं 35 ए को हटाने के लिए बहुमत की तलाश कर रही है, देश में हो रही देशद्रोही गतिविधियों को रोकने के लिए धारा 124 ए को मजबूती से लागू करने को सोच रही है, आतंकवादियों एवं नक्सलवादियों को खत्म करने में जुटी है, देश पड़ोसी दुश्मन मुल्कों को कड़ा जवाब दे रही है, देश में विकास की गति को रफ्तार दे रही है, जहां तक अभी तक कोई सरकार नहीं पहुंची वहां तक पहुंच रही है जैसे शौचालय निर्माण से लेकर गरीबों का गैस कनेक्शन, आवास निर्माण, किसानों को सहयोग राशि, मुद्रा योजना आदि बहुत सारी योजनाओं से लोगों को लाभान्वित कर रही है, राम मंदिर को संवैधानिक दायरे के अंदर बनाने की प्रयास कर रही है।

तो वही इन सब से हटकर विपक्षी दल सत्ता प्राप्त करने के लिए खुली चुनौती देते हुए देश में देशद्रोही शक्तियों को बढ़ाने के लिए धारा 124 ए को समाप्त करने की बात कह रही है। धारा 370 एवं 35 ए को और मजबूत करने की बात कह रही है। जम्मू कश्मीर में अलगाववादियों का साथ दे रही है, भारत तेरे टुकड़े होंगे जैसे गैंग लोगों के साथ खड़ा हो रही है, देश को आर्थिक दृष्टि से खत्म करने के लिए लोगों को ₹72000 की लालच दे रही है। फिर भी इस देश में कुछ लोग इन सारी देश की मुद्दों को छोड़कर जात पात की राजनीति कर रहे हैं। हमारे गांव देहात में एक भोजपुरी में कहावत कही जाती है कि “पढ़ – लिख के गधा भईल बाड़s” शायद आज की राजनीति माहौल में कुछ पढ़े लिखे लोग गधा बन चुके हैं जो जात पात की राजनीति कर रहे हैं और बेरोजगारी की हवाला दे रहे हैं। बात यह है कि कुछ लोगों को राजतंत्र में जीने का आदत सी लग गई है जो वंशवाद को अपना सरकार मानती है।

अंत में मुझे एक ही बात कहना है कि कम से कम लोगों को यह सोचना चाहिए कि जो 70 वर्षों में कुछ नहीं किया वह अब क्या करेगा?

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