सर्द की रात( विरह)

रूपमाला छंद

शिल्प-14’10की यति पर चरणान्त गुरु लघु
मापनी-2122,2122, 2122 21
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काटते कटती नहीं है ,सर्द की यह रात।
याद आती है मुझे प्रिय ,प्रेम की हर बात।

नींद आँखों से छिटक कर, हो गई है दूर।
हाय विरहा आग होती, है बड़ी ही क्रूर।
दर्द साये में समेटे ,कर रहें आघात।
काटते कटती नहीं है ,सर्द की यह रात।

काल बीते जा रहे हैं ,तज गया मधुमास।
लुप्त सब रस राग है अब, पीर केवल पास।
घोलती तम कालिमा से,कष्टमय जज्बात।
काटते कटती नहीं है ,सर्द की यह रात।

तीर विष की भोंकती हृद में बढ़ाती हूक।
है विरह की बेबसी से ,शब्द सारे मूक।
आज आँखों से हुई है, टूट कर बरसात।
काटते कटती नहीं है ,सर्द की यह रात।

सर्द रातें संग लाती, है बला की प्यास।
है दशा यदि ज्ञात हृद की ,सद्य आओ पास।
तन सुलगता ही रहा जब, भी हुआ हिमपात।
काटते कटती नहीं है ,सर्द की यह रात।

वेदना संतप्त हृद में ,व्यग्र व्याकुल प्राण।
भस्म तन होने लगा प्रिय ,है तुम्हीं से त्राण।
तुम नहीं तो मैं नहीं हूँ ,मात्र इतना ज्ञात।
काटते कटती नहीं है ,सर्द की यह रात।
लक्ष्मी सिंह
नई दिल्ली

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