सरस्वती-वन्दना (गीत)

सरस्वती-वन्दना
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हृदयांगन में चरण कमल रख कर उपकृत कर दे !
वीणावादिनि ! साधकजन को सृजन मनोहर दे !

धुन–लय-तान मधुर मुखरित हो,
जन-मन को ले मोह,
उन्नत हो आरोह स्वरों का
हिय-प्रिय हो अवरोह ।

झंकृत हों उर-तार साधना में नव-रस भर दे !
वीणावादिनि साधकजन को सृजन मनोहर दे !

हिल-मिल साधक रहें परस्पर,
रहे न तनिक बिछोह,
हृदयस्थल पुलकित कर दे माँ,
दूर रहे विद्रोह ।

तम हर नेह दीप्ति से उर को आलोकित कर दे !
वीणावादिनि ! साधकजन को सृजन मनोहर दे !

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हरीश चन्द्र लोहुमी, लखनऊ (उ॰प्र॰)
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