सरस्वती वंदना

वीणावादिनी तू जन-मन में देशभक्ति भर दे ।
दुर्बल आत्मनिर्भर हो जाएँ ऐंसी शक्ति भर दे।

नई-नई कोमल कलियों को खिलने का पूरा अवसर हो ।
राष्ट्र बने मजबूत विश्व में , माता अब तुम ऐंसा वर दो ।
फूलों की भी मधुर गंध से, बगिया हो जाए आनन्दित ,
पक्षी निर्भय , अनुशासित हों, जंगल भी हो जाए मुदित ।
रूखे-रूखे इस ग़ुलश़न को माँ, सिंचित कर दे ।

नदियाँ जुड़ जाएँ नदियों से,सड़कों का बिछ जाए जाल।
उन्नति के हर-एक क्षेत्र में , चमका माँ भारत का भाल।
भ्रष्टाचार खत्म़ कर दे माँ , काला-धन वापिस करवा दे ,
दुश्मन भौंचक्का रह जाए , दले न उसकी कोई दाल ।
आतंकी संघों को माता , शीघ्र नष्ट कर दे।
वीणावादिनी तू जन-मन में देशभक्ति भर दे।
दुर्बल आत्मनिर्भर हो जाएँ ऐंसी शक्ति भर दे ।

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