May 23, 2017 · कविता
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सरकारी स्कूलों की व्यथा….

.
मास्टर जी विद्यालय में बैठ
बच्चों से पंखा झलवा रहे थे
खुद भी हवा और अपने
रिश्तेदार को भी खिलवा
रहे थे!
सरकारी भोजन से अतिथि
सत्कार करवा रहे थे
मिड-डे-मील में राजमा
चावल खिलवा रहे थे
और फिर चारपाई पर
चरमरा रहे थे
मँगवाकर दूध फिर सबकी
खातिरदारी करवा रहे थे!
मास्टर जी के घर जब कोई
अतिथि आवें
मास्टर जी बस विद्यालय लिवा
लावें
बच्चों के विकास की यही दुर्दशा
थी!
एक दिन खबर लगी बी. एस. ए
साहब को!
साथियों से कहा चलो भाई
हम भी चलेंगे
इधर मास्टर जी का प्रोग्राम शुरु था
सारे बच्चे सेवा-सत्कार में जुटे थे
कक्षा सात की क्लास में कक्षा
आठ का सवाल लगा था !
और कक्षा 6 में मास्टर जी
की मनोदशा का चित्र बना था
दूध का प्रोग्राम इधर शुरु था
बी. एस. ए. जी धड़धड़ाते
पहुँच आये!
मास्टर जी की सोचो अब क्या
दशा थी
हाथ-पाँव सब फूल रहे थे
पसीना पटापटा रहा था
बी. एस. ए. ने किया निरीक्षण
बोले मास्टर जी आपकी मानसिक,
और शारीरिक शक्ति कमजोर हो रही है
मैंने एक उपाय सोचा है
क्यूँ ना चार -पाँच भैंस यही बँधवा दी
जाए स्वास्थ्य भी सही होगा आपका
और बच्चो को भी पढ़ने में मजा आये
लेकिन भैंस की रखवाली मास्टर जी आप
से ही की जाए!
कण्डा गोबर घर न लें जाए
मास्टर जी पकर लिये कपार
बोले अब मास्टरी से भैंसगिरी
इसका होगा कोई उपाय
ना पिये होते दूध तो ये बला
ना आयी होती
अब तो बस भैंस बनना ही
रहा उपाय!
देखकर मास्टर जी की दुर्दशा
अतिथि! बोले भइया अब
चलते हैं! लेकिन
दूध, दही मट्टा अब रोज
भिजवाते रहियो!
मास्टर जी से अब कुछ
कहा न जाए….
.
शालिनी साहू
ऊँचाहार, रायबरेली(उ0प्र0)

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