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सरकारी नाखून

बसंत कुमार शर्मा

बसंत कुमार शर्मा

गीत

July 14, 2017

चुभते सदा गरीबों को ही,
सरकारी नाखून.
पट्टी बाँधें हुए आँख पर,
बैठा है कानून.

धर्म और ईमान भटकते.
फुटपाथों पर दर दर.
फलती और फूलती रहती,
बेईमानी घर घर.

सोमालिया रहे सच्चाई,
झूठ बसे रंगून.

पैसे लिए बिना कोई भी,
कब थाने में हिलता.
जेब गरम करता पटवारी,
तब किसान से मिलता.

लगे वकीलों के चक्कर तो,
उतर गयी पतलून.

कभी बाढ़ ले गयी बहा तो,
कभी पड़ गया सूखा.
भरे हुए घर आढ़तियों के,
हर किसान है भूखा.

जीवन भर की खरी कमाई,
सोख रहा परचून.

Author
बसंत कुमार शर्मा
भारतीय रेल यातायात सेवा (IRTS) में , जबलपुर, पश्चिम मध्य रेल पर उप मुख्य परिचालन प्रबंधक के पद पर कार्यरत, गीत, गजल/गीतिका, दोहे, लघुकथा एवं व्यंग्य लेखन
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