# सम्पूर्ण सांग :- चमन ऋषि - सुकन्या #

सांग :- चमन ऋषि – सुकन्या |

वार्ता:-
सज्जनों! जब पाण्डवों को वनवास मिला हुआ था उस समय पांचों पाण्डव और साथ में द्रौपदी रानी लोमश ऋषि के आश्रम में गये। उन्हें देखते ही ऋषिवर ने पूछा हे राजन् ! क्या कारण है कि आप द्रौपदी रानी सहित सभी भाई वन में विचरण कर रहे हो। फिर धर्म पुत्र युधिष्ठिर ने अपनी जुए वाली सारी कहानी बताते हुए कहा कि हे ऋषिवर! हमारा सम्पूर्ण राज्य कौरवों ने धोखे से जीत लिया। इसलिए हमारी द्रोपदी राणी जैसी कोई भी नारी इस संसार में दुखी नहीं है। इसलिए हम महादुखिया द्रोपदी सहित वनवासी हुए फिरते है। फिर धर्म पुत्र की बात सुनकर ऋषि लोमश ने कहा हे महारथी ! पाण्डूनंदन तुम्हारी राणी द्रोपदी नारी से पहले तो बहुत सी बड़ी बड़ी दुखीया नारी हो चुके है। इसलिए मै आपकी संतुष्टि के लिए एक प्राचीन इतिहास सुनाता हॅू जिसका नाम है, चमन ऋषि और सुकन्या । ये कथा उस समय की है जब 12 वर्ष की लड़की सुकन्या ने अपने बूढे़ पति च्यवन ऋषि जो अंधा था उसको पतिव्रता धर्म और सतीत्व से जवान बना लिया था। जो ब्रह्मा जी से मरीचि, मरीचि के पुत्र कश्यप, कश्यप के पुत्र विवस्वान (सूर्य), विवस्वान (सूर्य) के मनु, मनु के दसवें पुत्र शर्याति राजा और फेर उसी सूर्यवंशी खानदान मे राजा शर्याति की लड़की सुकन्या हुई और उधर फिर भृगुवंशी खानदान मे फिर चमन ऋषि हुए| फिर लोमश ऋषि उन पांडवो को उस प्राचीन इतिहास के बारे मे कैसे बताते है|

जवाब:- लोमश ऋषि का।

(1)

पाण्डू गये आश्रम के म्हां ले गैल द्रौपदी राणी नै
लोमश ऋषि बतावण लागे एक प्राचीन कहाणी नै । । टेक । ।

परमजोत परमेश्वर नै शक्ति से आसमान रचे,
नाभि से कमल, कमल से ब्रह्मा, जिसनै सकल जहान रचे,
ग्यारह रूद्र रचे क्रोध से फिर सबके अस्थान रचे,
बामे अंग तै शतरूपा नारी स्वयंभू मनु जवान रचे,
उन दोनों का ब्याह करवाया खुद ब्रहमा ब्रहमाणी नै ।।

बारह सूर्य, छप्पन चांद, 51 विष्णु, विश्वे बीस हुए,
जल वायु से जगत रचाया, जगत पिता जगदीश हुए,
14 मनु, 700 इन्द्र, कल्प में एक महीश हुए,
सामवेद संगीत कला मै नृत राग छतीस हुए,
तीन ताल, सुर सात बताये, सरस्वती कल्याणी नै ।।

ब्रह्मा से मरीचि, मरीचि के कश्यप, कश्यप कै 13 नारी,
13 के मनुष-देवता-निश्चर-किन्नर-गंधर्व देह धारी,
कश्यप का बेटा होया सूर्य करदी अग्न पवन जारी,
अण्ड-पिण्ड, उदभेज, जेरण्ड से देई रच दुनिया सारी,
मोह माया से मिथुन सृष्टि रची आग और पाणी नै।।

सूर्य कै बेटा हुआ मनु जिसनै दस अश्वमेघ रचाई थी,
दस पुत्र हुई कन्या ग्यारहवी, जो बुध गैला परणाई थी,
दसवां पुत्र शर्याति राजा, जिसकै सुकन्या जाई थी,
भृगुवंशी खानदान में वा च्यवन ऋषि के ब्याही थी,
कहै राजेराम कथा महाभारत मैं, देख ब्यास की वाणी नै ।।

वार्ता:-
सज्जनों! अवधपुरी मे सूर्यवंशी खानदान मे राजा शर्याति हुए जिनकी 4 हजार रानियाँ हुई और राजा की एक लड़की थी जिसका नाम सुकन्या था लेकिन राजा को कोई पुत्र नहीं था। फिर राजा ने पुत्र प्राप्ति के बारे मे ब्राह्मणों से सलाह ली और फिर ब्राहम्णों ने राजा को पुत्रेष्टि यज्ञ करवाने की सलाह दी। उसके बाद यज्ञ-हवन के लिए नर्मदा नदी के किनारे राजा अपनी रानियो और सेना सहित वन में जाते है। फिर कवि वहा का वर्णन कैसे करता है|

” दोहा “

एक दिन बनके चले मुसाफिर, मन के म्हां कुछ अरमान थे,
एक तरफ नै रास्ता और एक तरफ शमशान थे,
रस्ते मे एक हड्डी आई उस हड्डी के ये बयान थे,
चलने वाले जरा सम्भलके चल हम भी कभी इंसान थे।।

जवाब- कवि का

(2)

शर्याति राजा छत्रधारी, कुटम्ब कबिला सेना सारी,
यज्ञ हवन की करके त्यारी, चाले बियावान मै ।। टेक ।।

भूप थे 14 विद्या ज्ञानी, उसकी अवधपुरी रजधानी,
रानी 4 हजार बताई, होया फेर भी पुत्र नाहीं,
महाराणी कै सुकन्या जाई, वा थी उम्र नादान मै ।।

पहुंचगे नदी नर्मदा के तीर, छोड़के अपणी जन्म जांगीर,
उडै़ परम फकीर तपै संन्यासी, पण्डित लोग पढ़े हुए काशी,
भूप मंत्री रानी दासी, बैठे हर के ध्यान मै।।

उड़ै था च्यवन ऋषि का डेरा, सज्जनों किसे-2 नै बेरा,
चेहरा ऋषि का ना देख्या भाला, ढीमक चढ़री मोटा चाला,
आंख चमकती जुगनूं की ढाला, जणुं दो तारे असमान में।।

सुकन्या सब सखियां तै मिली, ऋषि के डेरे में आई चली,
कली राजेराम नै चार जोड़दी, सुकन्या नै कलम तोड़दी,
च्यवन ऋषि की आंख फोड़दी, थी अनजान में।।

वार्ता:-
सज्जनों! जब राजा शर्याति अपने परिवार सहित नर्मदा नदी के किनारे पहुंचे तो वहां पे परम फ़क़ीर, सन्यासी व शास्त्री विद्वान पंडित बैठे हुए थे| फिर राजा भी परिवार सहित वहां पे प्रभु का स्मरण करते है| फिर वहां से राजा परिवार सहित थोडी दूर जंगल बियाबान की तरफ चले, उस तपोवन मे कई कई वर्षो से बड़े बड़े ऋषि, मुनि, सन्यासी और तपस्वी प्रभु के ध्यान मे श्रुति लगाये हुए थे| फिर उसी तपोवन मे उन्ही ऋषि-मुनीयों मे से एक चमन ऋषि अपने अस्थान मे ईश्वर भक्ति मे लौलीन थे| फिर यज्ञ करते समय राजा शर्याति की नादान लड़की सुकन्या अपनी सखियों के साथ बिना बताये खेलते खेलते पास मे ही चमन ऋषि के आश्रम मे चली जाती है और वहां पे उसको चमकती हुई कुछ चीज दिखाई दी| फिर उस आश्रम मे नादान सुकन्या गई तो ऋषि के पुरे शरीर मे ढीमक चढ़ा हुआ था तथा ऋषि के शरीर को पहचान न सकी क्यूकि सिर्फ उसकी आँखे आँखे ही चमक रही थी| उसके बाद सुकन्या ने जुगनू समझकर चमन ऋषि की आखों में शूल चुभो दी और ऋषि की आँखों से खून की धार बहने लगी इसलिए ऋषि की समाधि खुल गई | ऋषि ने उसी समय फिर सुकन्या को श्राप दे दिया कि तेरे कुटुम्ब को कोढ लग जाये, लेकिन सुकन्या नादान होने के कारण इस बारे मे बिल्कुल अनजान थी । फिर वह सुकन्या घबराकर वापिस वहीँ आ जाती है और फिर अचानक राजा सहित पुरे कुटुम्ब का मल मूत्र बंद हो जाता है तो फिर राजा इस बारे मे उन पंडितों से पुछता है । पंडितों ने बताया कि हे राजन्! इस जंगल मे कोई गलती से कोई ऋषि-मुनि सताया गया तथा हमसे भूल के कारण कोई बड़ा पाप हुआ है जिससे हमारा यज्ञ भंग हुआ है और पंडित विद्वान क्या कहते है |

जवाब:- पंडितों का।

(3)

पाया ना भेद क्षत्री, ऐसी हर की माया ।। टेक ।।

प्रजापति दक्ष भूप ने यज्ञ आरम्भ करवाया,
सती हवन में जलके मरगी यज्ञ भंग होया,
उसनै शिवजी ना बुलाया।।

राजा शीलध्वज नै यज्ञ पूरा भृगु तै करवाया,
बारह साल तक काल पड़े थे शाप गुरू ने दिया,
पत्थर का बणाया।।

रोमपाद राजा के राज मै पड़ा भारी काल बताया,
बुलवाया था ऋषि श्रृंगी, बेटी का डोला देकै राज मै बसाया।।

राजेराम कहै वोहे बणेगा जो मालिक नै चाह्या
पंडित कहण लगे राजा तै यज्ञ भंग होया,
कोए ऋषि सताया ।।

वार्ता:-
सज्जनों! फिर पंडितो विद्वानों ने ये तो बता दिया कि कोई महापाप हुआ है और कोई ऋषि सताया गया है लेकिन ये नहीं पता चला कि क्या हुआ, कैसे हुआ, और कहाँ हुआ | फिर सुकन्या पुरे कुटम्ब को दुखी देखकर घबरा गई और सुकन्या अपने पिता राजा शर्याति से पूरी कहानी कैसे बताती है ।।

जवाब:- सुकन्या का राजा से।

(4)

राजकुमारी, सुकन्या प्यारी, रोकै बेचारी,
ये बात कहण लागी ।। टेक ।।

कन्या बोली जोड़के हाथ, पिता जी सुण बेटी की बात,
मेरै साथ सहेली, जा बण मै खेली, गई पाट अकेली,
वै मेरे तै फहण लागी।।

गुफा मै लागै थे चमकारे, ध्यान मै दो जुगनूं से आरे,
म्हारे मन में न्यूं आई, मनै शूल चलाई, दिया खून दिखाई,
धार बहण लागी।।

जाणूं कोई सुखी पेड़ खड़ी, हालके माटी दूर झड़ी,
पड़ी भनक कान मै, रै बेईमान मै, था इंसान मै,
के चोट सहण लागी।।

राजेराम ऋषि की वाणी, था कौण पापी नीच प्राणी,
ना जाणी धाक मेरी, खोई शाक मेरी, फोड़ी आंख मेरी,
मै सुणके दुखी रहण लागी।।

वार्ता:-
सज्जनों! राजा शर्याति अपनी बेटी सुकन्या की नादानी मे की हुई गलती की बात सुणके राजा शर्याति अपनी महाराणी के पास जाकर नादान सुकन्या की गलती से लगी हुई अपनी करड़ाई के बारे क्या कहता है।।

जवाब:- राजा का राणी से।

(5) (बहरे-तबील तीसरी प्रकार का )

होई कर्मा की हाणी, पड़गी बताणी, भोई नै राणी, गुजारे सितम ।।टेक।।

पाणी दाणा छुट्या, मेरा जमाना छुट्या, जैसे बुलबुल का गुलशन में आणा छुटया,
चिंता मै पीणा खाणा छुटया, मेरा अधम बिचालै टुटै सै दम।।

शेर कै ताप निवाई चढी, सिर पै बिलाई चढ़ी, अधर्म की बेल चढ़ाई चढ़ी,
केतु राहू की करडाई चढ़ी, रूठे भाग विधाता शनि और यम।।

यो जंग हो गया, यज्ञ भंग हो गया, इब मरण का ढंग हो गया,
ऋषि सताया न्यूं मै तंग हो गया, देख्या ना जाता ये मेरा कुटम।।

जा ना बात लुह्की, सारी प्रजा दुखी, पुत्र सुपात्र तो मां-बाप सुखी,
कहै राजेराम शर्म से अखियां झुकी, समझणिया नै मारै सै गम।।

वार्ता:-
सज्जनों! फिर राजा शर्याति अपनी अचानक लगी ग्रह-चाल और सुकन्या से हुई अनजान गलती के बारे मे महारानी को बताता है | फिर सुकन्या की इस अनजान गलती की माफ़ी के लिए राजा शर्याति, महारानी, मंत्री और लड़की सुकन्या सहित उसी समय उस च्यवन ऋषि के आश्रम मे जाते है। जब सभी ऋषि के पास पहुंचे तो चमन ऋषि क्रोध मे थे| फिर राजा शर्याति प्रणाम करते हुए अपना परिचय देकर ऋषि से अपनी बेटी सुकन्या से की हुई गलती के बारे माफ़ी मांगते है तथा फिर क्रोध मे बैठे चमन ऋषि राजा को माफ़ नहीं करते है तथा राजा एक बार फिर अर्दास करते है| लेकिन फिर ऋषि कहते है कि मै एक शर्त पर तुमको माफ़ कर सकता हूँ| फिर चमन ऋषि राजा के सामने अपनी शर्त रखकर क्या कहते है।।

जवाब:- चमन ऋषि का।

(6)

तेरी सुकन्या नै आंख फोड़दी, कर दिया ब्रह्म दुखी मेरा,
दरगाह में राजा शर्याति न्याय होगा म्हारा तेरा ।। टेक ।।

गऊ ब्राहम्ण साधु की सेवा क्षत्रि ने करणी चाहिए,
के कारण था ऋषि सताया अन्यायी चाल्या जाइये,
सुकन्या ने आंख फोड़ी उसनै मेरे स्याहमी लाइये,
जब उतरेगा दोष तेरा इस लड़की नै मेरै ब्याहीये,
ना तीन जन्म तक कोढ़ मिटैगा, हो कुम्भीपाक तेरा डेरा।।

था सत्यव्रत अयोध्या का राजा जिसकै हरिश्चन्द्र जाया,
त्रिशंकु पडय़ा नाम ऋषि की कन्या नै ठाके ल्याया,
दिया फेंक देवत्यां नै सुरग तै वो दुष्ट देखणा ना चाहया,
वो रोक लिया विश्वामित्र नै न्यूं धरती पै ना आया,
अधम बीच मै लटकै पिंजरा, त्रिशंकु दर्शन देरा।।

विश्रवा ऋषि गया रात नै गऊ की हत्या सर लागी,
नाश कराया रावण नै भी ऋषियां कै जब कर लागी,
नाहकसुर नै लात मारदी ऋषि के चोट जबर लागी,
ऋषि के शाप तै नाग बण्या नागराज कै पर लागी,
स्वर्गपुरी का नाहुक गया, नरक मै न्यूं गेरा।।

मेरी बूढ़ै वारै आंख फोड़दी लागै दोष जरूर तनै,
इस लड़की नै मेरै ब्याहदे जै हो राजन मंजूर तनै,
ना तो माफ करूं कोन्या इसा कर दिया डबल कसूर तनै,
राजेराम लुहारी आला सहम करया मजबूर तनै,
जिसकै लागै वो जाणै, तू बेदर्दी तनै के बेरा।।

वार्ता:-
सज्जनों! राजा शर्याति ऋषि की बात सुनके कहता है कि हे ऋषि! ये सुकन्या नादान लड़की थी | इसने अनजाने मे ये इतना बड़ा कसूर कर दिया| फिर चमन ऋषि कहता है कि हे राजन ! मेरे दोनों नेत्र फूटने से मै अँधा हो गया हूँ और अब बुढ़ापे मे मुझ अंधे की सेवा कौन करेगा और फिर कहता है कि जिसको जो चोट लगती है उसको ही पता होता है कि दर्द क्या होता है इसलिए इसने जो गलती की है उसको इसका फल जरुर भोगना पड़ेगा | इस प्रकार चमन ऋषि अपनी जिद्द पर अड़ीग रहता है | फिर राजा कहता है कि हे ऋषि ! गलती हमेशा इन्सान से ही होती है | राजा शर्याति एक बार फिर से हाथ जोड़कर चमन ऋषि से माफी मांगता है और ऋषि के पैर पकड़कर क्या कहता है।

जवाब:- राजा का।

(7)

हाथ जोड़के बोल्या छत्री पकड़ ऋषि के पांव,
आदमी तै हो सै गलती माफ करी जा ।। टेक ।।

के करले इंसान होणी आपणे बल चलती,
ग्रहचाल और बख्त घड़ी ना टाले तै टलती,
पायां मै लोटज्या तै के नहीं दुश्मन माफ करै गलती,
राखी लहाज रहै माणस की आंख सदा मिलती,
सुबेरै ते शाम ढलती फिरती हो सै छां।।

मेरी सुकन्या बेटी याणी बारह साल की,
गलत मुहूर्त टेम घड़ी थी कोए ग्रहचाल की,
भूल गये ब्रह्मा गिणती सागर की झाल की,
सूर्य का भी अर्थ डटया ऋषियों की पालकी,
निर्भंग प्रजा पड़ी काल की ना राणी भोजन खां।।

लिछमी और लुगाई सुन्नी कदे घर पै ना डटै,
जींदे जी कमाये बिना उम्र ना कटै,
कर्म करया फल नहीं मिलै कौण राम नै रटै,
पक्के प्रण बात के छत्री उल्टे ना हटै
बरते बेरा पटै किसा माणस का शील सुभा।।

चैबीसी के साल बणी रागणी तमाम,
गाम हमारा लुहारी सै जमीदारा काम,
पाणची सै पुर कै धोरै गुरू जी का धाम,
अवधपुरी का राजा सू शर्याति मेरा नाम,
कहै राजेराम माफ करदे सुकन्या दूंगा ब्याह।।

वार्ता:-
सज्जनों! फिर राजा शर्याति के बार बार प्रार्थना करने पर भी चमन ऋषि उनको माफ़ नहीं करते और आखिरकार राजा सभी विद्वान् पंडितो और मंत्रियो से सलाह लेके, फिर चमन ऋषि के श्राप से बचने के लिए और सारे कुटुम्ब को सुरक्षित रखने के लिए राजा ने सुकन्या की च्यवन ऋषि के साथ शादी कर दी| फिर जब राजा कुटुम्ब सहित जब घर की तरफ चलने लगे तो महाराणी अपनी बेटी सुकन्या के बारे मे चिंत्या व्यक्त करते हुए राजा सर्याती से क्या कहती है।।

जवाब – महाराणी का

(8)

महाराणी नै सुणकै ऋषि के बोल,
न्यू कहणे लगी क्षत्रधारी नै ।। टेक ।।

यज्ञ भंग होया आश्रे छूटटे, पुत्र हों ना भाग सै फुटटे,
गोड्डे टुट्टे मेरी काया डामाडोल, उस कन्या की चिंत्या भारी नै ।।

मेरी सुकन्या 16 राशी, बुड्डा पति मिल्या बणोवासी,
यो सन्यासी भिखमंगे का रोल, ब्याहवै इसकै राजकुमारी नै ।।

याणी बेटी पति बडेरा, जी तड़तोले खा सै मेरा,
चमकै चेहरा मुख चंदा सा गोल, देखु इसकी सूरत प्यारी नै ।।

राजेराम लुहारी आला, समरै दुर्गे मात ज्वाला,
माई घट का ताला खोल, दिए ज्ञान सुर-लयदारी नै ।।

वार्ता:-
सज्जनों! राजा और रानी कुटुम्ब सहित जब घर चलने लगे तो वो नादान सुकन्या विलाप करती हुई अपनी माता से क्या कहती है।

जवाब – सुकन्या का |

(9)

चाल पड़ी बियाबान मै, मनै किसकै सहारै मेरी मात,
अकेली नै छोड़के जा ऋषि के डेरे मै ।। टेक ।।

बूढ़ा पति मेरा नेत्रहीन सै, ओ भी मेरै अधीन सै,
मै चालूूंगी पकड़ के हाथ, अकेली नै छोड़के जा ऋषि के डेरे मै।।

छड़े-कड़े रमझोल ना, माला हार गुलीबंध ढोल ना,
पहरी ना टूम-ठेकरी नाथ, अकेली नै छोड़के जा ऋषि के डेरे मै।।

बोलै शेर-बघेरे बियाबान मै, खोऊंगी डरती अपणी जान मै,
थर-2 कांपै मेरा गात, अकेली नै छोड़के ऋषि के डेरे मै।।

या दुनियां नहीं मेरे काम की, मै दासी राजेराम की,
उसकी गौड़ ब्राहम्ण जात, अकेली नै छोड़के ऋषि के डेरे मैं।।

वार्ता:-
सज्जनों! फिर सुकन्या को विलाप करती देखके उसकी माता महारानी चलती चलती सिर पुचकार कर सुकन्या को क्या समझाती है।।

जवाब:- सुकन्या की माता का।

(10)

लिख्या भाग में था सुकन्या तनै अंधा पति मिला,
तू इसकी सेवा करियें इसमै ऐ तेरा भला ।। टेक ।।

गूंगा-बहरा, कोढ़ी-कंगला पति भगवान सती नै,
पति-पत्नी तै रची सृष्टि उस ब्रह्मा-ब्रह्मवती नै,
करी तपस्या पार्वती नै, लेई शिव की खींच कला।।

बूढ़ा पति सुकन्या याणी कदे बात सोचले गम की,
पत्नी करे पति की सेवा बण ताबेदार हुक्म की,
नार अहिल्या थी गौतम की, पात्थर की बणी शिला ।।

मात-पिता हो जन्म देण के ना जा तकदीर बटाई,
तनै बूढै वारै आंख फोड़दी न्यूं च्यवन ऋषि कै ब्याही,
तेरी करणी तेरै आगै आई, ना म्हारा जोर चला।।

राजेराम कद गाणा सिख्या, न्यूं बुझै दुनिया सारी,
बीस कै साल पाणछी मै देई गुरू नै ज्ञान पिटारी,
हांसी रोड़ पै गाम लुहारी, भिवानी शहर जिला।।

वार्ता:-
सज्जनों! फिर राजकुमारी सुकन्या की च्यवन ऋषि से शादी करके राजा शर्याति अपनी सेना सहित कुटुम्ब के साथ राजधानी में आ जाते है। उधर सुकन्या ऋषि की सेवा में लग जाती है। लेकिन अपने मात पिता और परिवार बिना मन ही मन उदास रहने लग जाती है और फिर अपनी पत्नी सुकन्या को उदास देखकर चमन ऋषि क्या कहता है।

जवाब:- ऋषि का सुकन्या से।

(11)

मेरी बूढै वारै आंख फोड़दी राजकुमारी सुकन्या,
न्यू तेरी मेरी शादी होगी चिंता भारी सुकन्या ।। टेक ।।

एक वैवस्त मनु सूर्य का बेटा जिसके पुत्र थे ग्यारा,
11वां पुत्र घणा लाडला मात पिता का हद प्यारा,
शिवजी के मंदिर मै पहुंचा गैल फौज का था लारा,
शिव-पार्वती बैठे थे ओ दुष्ट देखकै दुत्कारा,
उस लड़के की लड़की करदी, वा बुध की नारी सुकन्या।।

सौ-2 दासी करया करै थी, वा टहल नहीं जंगल के म्हां,
हाथी-घोड़ा पीनस-पालकी, वै शैल नहीं जंगल के म्हां,
आड़ै धरती मै सोणा रूई के पहल नहीं जंगल के म्हां,
फिरे एकली सखी-सहेली गैल नहीं जंगल के म्हां,
एक कुटी मै रहणा सै, ना महल अटारी सुकन्या।।

बूढ़ा-ठेरा पति तेरा तू सै याणी सुकन्या,
नहीं पास मै तेरै साथी नणंद-जेठाणी सुकन्या,
लिखी भाग मै इस बणखंड की ठोकर खाणी सुकन्या,
के बेरा कित तै ठा ल्याया तनै दाणा पाणी सुकन्या,
मैना रूकी पिजंरे के म्हां, आण बिचारी सुकन्या।।

देवल ऋषि की कन्या बोली ढूंढ़ पिता इसा वर ल्यादे,
अंधा नहीं सुनाखा हो ना मूर्ख और चतर ल्यादे,
नहीं मिलै तो मुनि उद्दालक के बेटे नै घर ल्यादे,
पीर-बावर्ची रूप ब्रह्म का और बेदाचारी नर ल्यादे,
राजेराम जात का ब्राहम्ण, गांम लुहारी सुकन्या।।

वार्ता:-
सज्जनों! फिर चमन ऋषि तो ज्ञानी ध्यानी थे, वे समय-समय पर नादान सुकन्या को समझाते रहते थे| इस तरह सतीत्व धर्म से सुकन्या च्यवन ऋषि की सेवा करती रहती और साथ साथ भक्ति में ध्यान लगाये रहती | फिर इस तरह समय बीतता चला जाता है और फिर एक दिन सुकन्या के पतिभ्रता धर्म की परीक्षा लेने के लिए सूर्य के पुत्रो अश्विनी कुमारों का दुसरे भेष में आना होता है। फिर वे सुकन्या से नर्मदा नदीं के किनारे मिलते है और सुकन्या को देखकर क्या कहते है।।

जवाब:- अश्विनी कुमारो का।

(12)

बियाबान मै कौण लुगाई,
कौण-कहां के रहणे आली, कहां से चाली आई ।। टेक ।।

नीर के भरण आई, एकली करण आई, नदी मै अस्नान,
छोड़ के कुटुम्ब आई, कती ना शर्म आई, उम्र तेरी जवान,
फिरै बियावान, कै म्हां भूलगी के राही।।

इन्द्र की इन्द्राणी सै, के ब्रह्मा की ब्रह्माणी सै, के लक्ष्मी सरस्वती,
चंद्रमा की रोहणी सै, के माया जग मोहणी सै, के काम की नार रती,
के भोले की पार्वती, हिमाचल की जाई।।

सासु कलिहारी दिखै, खसम जुआरी दिखै, रोज लड़ै तेरै साथ,
दुर्बल सै बाणा तेरा, छुट्या पीणा-खाणा तेरा, सहम गया क्यूं गात,
बीर की सै जात, फिरै भरती क्यूं तवाई।।

एकली चली आई, घर से क्यूं निकल आई, के जंगल म्य काम,
बोल के नै भेद बता, कौण तेरे मात पिता, के सुन्दरी तेरा नाम,
राजेराम, जमाना देख्या करके नै घुमाई।।

वार्ता:-
सज्जनों! फिर सुकन्या दुसरे भेष मे उन अश्वनी कुमारो पहचान नहीं पाती है और अश्विनी कुमारों की अह्की-बहकी बात सुनकर सुकन्या क्या कहती है।

जवाब:- सुकन्या का अश्विनी कुमारों से।

(13)

सादी भोली बीर सूं, करण पति की टहल आई,
जंगल बियावान मै ।। टेक ।।

मै याणी बड़ेरा पति टहल दिन-रात करूं,
संत-अतिथी का आदर जोड़के नै हाथ करूं,
थारे कैसे लफंंग्या तै कदे नहीं बात करूं,
फालतू निकम्में घर तै फिरै सै लफंगे चोर,
किसे का एतबार नहीं आ लिये भतेरे और,
डर लागै भयानक दिखै जंगल मै अंधेरा घोर,
कहै री थामनै अखिर सूं, इब तलक ना थारै आई,
बात मेरी ध्यान मै।।

भृगुं जी के सात बेटे पोलमा थी जिसकी नार,
दाता विधाता मर्कण्डु च्यवन कवि शुक्राचार,
औरंग ऋषि के बेटे थे ऋचक ऋषि आज्ञाकार,
एक राजा गांधी की बेटी सत्यवती जिसका नाम,
ऋचक ऋषि ब्याहके ल्याया जमदग्नि गये थे जाम,
जमदग्नि के पांच बेटे सबतै छोटे परशुराम,
मै वाहे शमशीर सूं, जो सहश्रार्जुन तै होई लड़ाई,
रूक्का पडय़ा जहान मैं।।

मरीचि ब्रह्मा के बेटे पढ़े लिखे थे विद्वान,
मरीचि के बेटे कश्यप, कश्यप के सूर्य नाराण,
सूर्य जी कै मनु होया शर्याति जिसकी संतान,
ससुर मेरे भृंगु जी नै या संहिता बणा राखी,
भुंगु पुत्र च्यवन ऋषि या बात ना छुपा राखी,
मै शर्याति की सुकन्या च्यवन ऋषि कै ब्याह राखी,
यो सरवर मै नीर सूं, मात-पिता नै पल्लै लाई,
सोचू सूं भगवान मै।।

मानसिंह तै बुझ लिये औरत सूं हरियाणे आली,
लख्मीचंद तै बुझ लिये गाणे और बजाणे आली,
मांगेराम तै बुझ लिये गंगा जी में नहाणे आली,
भिवानी जिला तसील बुवाणी लुहारी सै गाम मेरा,
कवियां मै संगीताचार्य यो साथी राजेराम मेरा,
मै राजा की राजकुमारी सुकन्या सै नाम मेरा,
कन्या शुद्ध शरीर सूं, च्यवन ऋषि की गैल ब्याही,
भृंगु खानदान मै।।

वार्ता:-
सज्जनों ! सुकन्या वहां से जल भरके कुटी पर आ जाती है फिर अश्विनी कुमार परीक्षा हेतु शाम को ब्राहम्ण के वेश में च्यवन ऋषि के आश्रम पर आ जाते है और वे एक रात बसेरा मांगते हुए उस सुकन्या से क्या कहते है।

जवाब:- अश्विनी कुमारों का सुकन्या से।

(14)

दो अतिथि घणी दूर के मांगै रात बसेरा हे,
रास्ता भूल कुटी पै आगे देख आश्रम तेरा हे ।। टेक ।।

भूखे प्यासे बियावान मै धक्के खाते डोलै
काल सुबह रोटी खाई थी भूख कालजा छोलै
जगहां ओपरी डर लागै ना किवाड़ कुटी के खोलै,
उल्लू-बागल, कुटिल-कोतरी, श्वान सामनै बोलै
रीछ-भेड़िया, बंदर-भालू, चीता-शेर, बघेरा हे।।

दिन छिप्या शाम होई आंख्या मै धूल पड़ी रस्ते में,
किले-पहाड़ छुटगी राही भूल पड़ी रस्ते में,
दिल गया टूट सोच मै काया कूल पड़ी रस्ते में,
कांटे-झाड़ी पैर उघाणे शूल पड़ी रस्तें में,
कीकर-कांच नागफण-बांसा राह मै खडय़ा पटेरा हे।।

बिन बुलाया रोज अतिथि कौण किसे कै आवै
दाणा-पानी लिख्या कर्म का भौं कोये सेती ल्यावै
बीर निकम्मी पुरूष आदमी देखके नाक चढावै
धर्म और श्रद्धा भागवान कै रोज अतिथि आवै
चातर बीर लक्ष्मी घर मै होया करै पां फेरा हे।।

लख्मीचंद स्याणे माणस गलती मै आणिये ना सै,
मांगेराम गुरू के चेले बिना गाणिये ना सै,
ब्राहम्ण जात वेद के ज्ञाता मांग खाणिये ना सै,
तू कहरी डाकू चोर, किसे की चीज ठाणिये ना सै,
राजेराम रात नै ठहरा ओं म्हारा घर डेरा हे।।

वार्ता:-
सज्जनों ! उन ब्राह्मण के भेष मे अश्वनी कुमारों की अर्दास सुणके सुकन्या क्या कहती है।

जवाब:- सुकन्या का।

(15) (शब्दवाणी भाषा )

सुकन्या बोली सुण मेरा एक बयान ।। टेक ।।

गृहस्थ धर्म, संत-अतिथी का राखू आदरमान,
ज्योतिष बेद-विधि नै जाणै पंडित सो विद्वान ।।

करूं रसोई भोजन करिए गंगा मै करके अस्नान,
कौण किसे कै आवै लावै दाणा-पाणी बलवान ।।

दर्शन दिए आज कुटी पै क्यूंकर पहुंचे आण,
भूखे-प्यासे फिरो भरमते यो जंगल बियाबान ।।

इतणी सुणकै तीनोें चाले धर ईश्वर का ध्यान,
राजेराम कहै तीर्थ के म्हा करण लगे अस्नान ।।

वार्ता:-
सज्जनों! फिर अश्वनी कुमार चमन ऋषि के आश्रम मे ठहरते है और भोजन करते है | अश्वनी कुमार देखते है कि सुकन्या तो जवान और चमन ऋषि बहुत वृद्ध हो चुके है | इस प्रकार फिर अश्वनी कुमार बे-मेल विवाह को देखकर उस चमन ऋषि को क्या कहते है |

जवाब:- अश्वनी कुमारों का।

(16)

गृहस्थ-आश्रम घरबारी का आत्म-खेल रहे जा सै,
बीर-मर्द जीवन के साथी जीवन-मेल रहे जा सै ।। टेक ।।

दुनियां बांधै उम्र के पाले दिन और रात कमाए जा,
पत्नी का धर्म पति की सेवा करकै साथ निभाए जा,
इज्जत-धर्म मान-मर्यादा लोक-ल्हाज मै गाए जा,
पति का रूप सति की शक्ति बैठी पूत खिलाए जा,
पिता से पूत, पूत से चलती वंश की बेल रहे जा सै।।

मोह-माया मै फंसी दुनिया सहम बावली होरी सै,
पति-पत्नी जीवन के साथी बंधी प्यार की डोरी सै,
मन की ममता, तन की तृष्णा, चित की चिंता चोरी सै,
गाड़ी जगत, पाप-पूण्य पहिए, पति और पत्नी धोरी सै,
गाड़ी चलै घूमता पहिया सख्त सकेल रहे जा सै।।

उम्र पुराणी धोले आगे तनै चाहिए ब्याह सगाई ना,
बुढ़ै बारै पूत कुपात्र मानै कहा लुगाई ना,
टोटे मै घरबारी दुखिया और रोजगार कमाई ना,
भरै तवाई सहम गात होज्या बहम दवाई ना,
बिकट-तमाशा घरवासा माणस की जेल रहे जा सै।।

त्रिया रूप मोहनी-माया शिवशंकर भी नचा दिया,
नारद नै ब्याह की सोची बांदर का फोटू खिचां दिया,
कहै राजेराम फंसा माया मै भगत हरि नै बचा दिया,
तु बुढ़ा जवान सुकन्या ब्याह किस तरिया जचां दिया,
बुढे़ बारै ब्याह करवाले न्यू धक्का पेल रहे जा सै।।

वार्ता:-
सज्जनों ! अश्वनी कुमारों की बात सुनके चमन ऋषि कहते है कि त्रिया के बिना तो सब कुछ अधुरा है क्यूकि हर चीज का आधार ही औरत है | इसी से सृष्टि रची और इसी से वंश बेल बढती है | इसलिए जो सबसे बड़ा आश्रम गृहस्थ-आश्रम जिससे सब कुछ आगे बढ़ता और जिस आश्रम के बिना स्रष्टि की कल्पना ही नही की जा सकती उसी आश्रम की धुरी भी एक त्रिया ही है | इस प्रकार चमन ऋषि अश्वनी कुमारो को औरत की महिमा के बारे मे समझाते हुए क्या कहते है |

जवाब:- चमन ऋषि का

(17)

जगजननी-जगदम्बे शक्ति का अवतार लुगाई सै,
चालै वंश बेल माणस की ताबेदार लुगाई सै ।। टेक ।।

प्रथम रच्या आकाश हरि नै पाछै रवि राकेश होए,
11 रूद्र रचे क्रोध से प्रकट शेष महेश होए,
ब्रहमा नै शतरूपा रचदी स्वयंम्भू मनू नरेश होए,
कार कंश कक्षुआ भारत वर्त आर्य देश होए,
प्रकट काल कलेश होए, यो जगत का सार लुगाई सै।।

शिवशंकर का साथ निभावै हिमाचल की पार्वती,
विष्णु जी का साथ निभावै के नहीं लक्ष्मी नार सती,
जगत रचावै साथ निभावै ब्रह्मा जी की ब्रहमवती,
इन्द्र गैल्या इन्द्राणी कामदेव संग नार रती,
गंगा-जमना-सरस्वती, ये तीनों धार लुगाई सै।।

ईच्छाधारी रूप बणाके माया जीव भलोणी सै,
माया ब्रहम का मेल जगत मै प्रकृति मन मोहणी सै,
सुर्यदेव की छाया पत्नी चंद्रमा की रोहणी सै,
काल की पत्नी का नाम कल्पना लाख चैरासी योनी सै,
बेदवती-भेमाता-होणी-भूमि, चार लुगाई सै।।

जगजननी और जगतपिता नै रचदी जगत-जेल माया,
गृहस्थ-आश्रम पति-पत्नी का पुत्र अगत-बेल माया,
बहु पूरजंनी-जीव पूरजंन ब्रहम से करै मेल माया,
राजेराम कमावै दुनिया चालै नहीं गैल माया,
आत्मरूप खेल माया, सबका परिवार लुगाई सै।।

वार्ता:-
सज्जनों! फिर चमन ऋषि की बात सुनके और सुकन्या की मेहमान-नवाजी व अतिथि सत्कार से खुश होकर अश्विन कुमार फिर अपना परिचय देते है और कहते है कि हम स्वर्गलोकी देवताओ के वैध है | फिर अश्वनी कुमार चमन ऋषि से कहते है कि आपकी क्या इच्छा है तो फिर चमन ऋषि कहते कि अगर तुम देवताओं के वैध हो तो मेरे को बुढ़े से जवान बनादो । ऋषि की बात सुनके अश्विन कुमार कहते है कि हमें यज्ञ में भाग नहीं मिलता इसलिए आप हमें पहले स्वयं यज्ञ में भाग दिलवाईए और फिर हम आपको जवान बना देंगे। फिर चमन ऋषि कहते है कि ठीक है मै आपको यज्ञ में भाग दिला दूंगा | फिर इतनी सुनकर ऋषि सहित तीनो नदी नर्मदा के तीर्थ में अस्नान करने जाते है और सुकन्या की परीक्षा लेने के लिए अश्वनी कुमार चमन ऋषि वाला ही रूप धारण कर लेते है और तीनों एक रूप के हो जाते है | फिर कुटी पे आ जाते है और सुकन्या की परीक्षा लेते हुए अश्वनी कुमार सुकन्या से क्या कहते है।

जवाब:- अश्विन कुमारों का।

(18)

म्हारै सेती चाल सुकन्या प्यारी,
यो बणवासी तू सै राजकुमारी ।। टेक ।।

क्यों होती फिरै बिरान एकली बण मै,
तेरा बूढ़ा पति तू जवान एकली बण मै,
जंगल बियाबान एकली बण मै,
लिकड़ै डरकै ज्यान एकली बण मै,
बोलै से आड़ै चिते शेर शिकारी।।

सूर्य की नारी करणे सैल गई थी,
सुभद्रा नार वरुण संग टहल गई थी,
बृहस्पति की नारी चंदा गैल गई थी,
या बात स्वर्ग मै सारै फेैल गई थी,
वा तारावती बणी बुध की महतारी।।

कुटी मै रहणा आड़ै महल हवेली कोन्या,
साथ रहै थी वै सखी सहेली कोन्या,
न्यूं ब्याह करवाण धक्का पेल्ली कोन्या,
नणंद जेठाणी सासूं गेल्ली कोन्या,
तेरा बालम बुढ़ा ठेरा सै लाचारी।।

तनै चाहिए जोड़ी का भरतार सुकन्या,
चालै नै म्हारै सेती नार सुकन्या,
तू राजकुवारी हो राजकुमांर सुकन्या,
हो ज्यागा तेरा बेड़ा पार सुकन्या,
कहै राजेराम सुखी रहै जिंदगी सारी।।


वार्ता:-
सज्जनों ! फिर सुकन्या ब्राहमण के भेष में उन अश्वनी कुमारो तथा अपने पति को पहचान नही पाती है और फिर अश्वनी कुमारो की बात सुनके सुकन्या क्या कहती है |

जवाब – सुकन्या का |

(19)

कितके सो कौण मेरी कुटी पै क्यों आऐ हो ।। टेक ।।

एक भेष मै दिखो थे थाम ब्राह्मण वेदाचारी,
देवता-दैत-मनुष देहधारी, मै पतिभ्रता नारी,
चाहवै ध्यान डिगाए हो ।।

सुंदर शान मुकुट सिर पै रुद्राक्ष की माला गल मै
चतुर घणे भरपूर अकल मै, फिरो सो क्यू जंगल मै
भूखे तिसाये हो ।।

न्हाण गये तीर्थ मै लेगे पति नै साथ बुलाके
होए तीनो एक शक्ल के न्हाके, क्यूकर पिछाणु आके
ना पिया दर्शाए हो ।।

के लेण परीक्षा ब्रह्मा-विष्णु-शिवजी आगे चलके
राजेराम कहै भेष बदलके, के चाहवै तीनु मिलके
मेरा सत आजमाये हो ।।

वार्ता :-
सज्जनों !फिर सुकन्या की बात सुनके अश्वनी कुमार उसका सत अजमाने के लिए सुकन्या को ऐशो-आराम का लोभ देकर अश्वनी कुमार सुकन्या को दोबारा क्या कहते है ।

जवाब:- अश्विनी कुमारो का।

(20)

धुर की सैर कराऊं बैठकै चालै तो म्हारे विमान मै,
फिरै एकली सुकन्या क्यूं जंगल बीयाबान मै ।। टेक ।।

सुमेरूं-कैलाश देखिए जड़ै शिवजी-पार्वती सै,
सुमेरूं तै काग भूसण्डी योगी परमगति सै,
राहु-केतु-शनि पास मै शुक्र-बृहस्पति सै,
आठ वसु, नौ ग्रह-देवता, दस दिगपाल गति सै,
सप्तऋषि, त्रिशकुं दिखै, ध्रुव भगत असमान मै।।

56 हजार लाख योजन पृथ्वी से चांद बताया,
चंद्रमा से तीन लाख योजन सूर्य कहलाया,
सूर्य से 13 लाख योजन ध्रुव-लोक परमपद पाया,
1700 योजन परमलोक ब्रहमा नै जगत रचाया,
आसमान का अंत फेर भी लिखा नहीं प्रमाण मै।।

पूर्व दिशा मै स्वर्गपुरी न्यूं संत-सुजान कहै सै,
दक्षिण दिशा मै यमलोक जगत-जहान कहै सै,
पश्चिम दिशा मै वरूणदेव बिलोचीस्तान कहै सै,
उतर दिशा मै चंद्रलोक बेद पुराण कहै सै,
सुर्य खड़या पृथ्वी घूमै लिख्या लेख विज्ञान नै।।

इंद्रलोक स्वर्गपुरी 15 सौ योजन का राह सै,
रास्ते मैं तपै 12 सूर्य ताती तेज हवा सै,
लाख चैरासी जियाजुन का धर्मराज घर न्या सै,
पूण्य और पाप तुलै नरजे मै वा सच्ची दरगाह सै,
राजेराम पार होज्यागा ला श्रुति भगवान मै।।

वार्ता:-
सज्जनों! फिर सुकन्या भी असमंजस में पड़ जाती है कि इन तीनों ब्राह्मणों में से तेरा पति कौन सा है ये पहचान नहीं पाती है | फिर अश्विनी कुमारो की बात सुनकर सुकन्या अपने सत कि रक्षा के लिए भगवान की स्तुती करते हुए क्या कहती है |

जवाब:- सुकन्या का।

(21)

तीन लोक के नाथ, लाज तेरे हाथ, इब मेरी सै,
एक सती बीर नै लेई शरण तेरी सै ।। टेक ।।

नर्मदा नदी मै न्हाकै होए एक शक्ल के माणस तीन,
तीनुवां मै पति मेरा बुढ़ा-ठेरा नेत्रहीन,
बुढ़े तै जवान होग्या किस तरियां करूं यकीन,
जलवाय, आकाश-जमीन, रवि-शशि और तारे,
किन्नर-नाग, वरूण-यम-अग्नि आदमदेह मै धारे,
आठ वसु, 11 रूद्र मेरे साक्षी तुम सारे,
मेरी फंसी विघ्न मै जान, होई परेशान, विपत गेरी सै।।

ब्रह्मा, विष्णु, शिवजी चाले भेष कर फकीर का,
सत अजमाया अत्री की अनसुईयां बीर का,
न्यूं बोले निवस्त्र होके भोजन जिमै खीर का,
अनसुईयां नै ब्रह्मा-विष्णु-शिवजी भी करे नादान,
पार्वती, ब्रहमाणी ना लक्ष्मी भी सकी पिछाण,
होई थी आकाशवाणी ये त्रिलोकी भगवान,
सुण प्रभू मेरी टेर, करो नै मेहर, नजर फेरी सै।।

साण्डली-सुनीता सती जाणै यो समाज प्रभु,
दमयंती-नर्मदा राखी सावत्री की लाज प्रभु,
पुत्र-पति दोनों दिए घिरे थे यमराज प्रभु,
दक्ष की 27 कन्या खूबसूरत थी देखण योग,
चंद्रमा नै ब्याहके त्यागी 27 नक्षत्र भोग,
दक्ष नै श्राप दिया घटण-बढ़ण का लाग्या रोग,
गया बिगड़ चांद का गात, उदन तै रात, भी अंधेरी सै।।

ब्रह्मा बणके प्रभु सृष्टि को रचाणे अाले,
विष्णु पालनहार प्रभु खेल के खिलाणे आले,
शिवजी बणकै प्रलय का संहार भी कराणे आले,
भगतों की पूकार सुणी दुष्टों का नाश करते,
जिसनै टेरा नाम प्रभु उसकी पूरी आस करते,
ब्राहम्ण कै जन्म धारया लुहारी मै वास करते,
तेरी माला सुबह शाम, कहै राजेराम, मनै टेरी सै।।

वार्ता:-
सज्जनों! फिर सुकन्या के स्तुति करने के बाद आकाशवाणी होती है। और आकाशवाणी सुकन्या को अश्वनी कुमारो का सम्पूर्ण परिचय बताकर उनका सारा मायाजाल समझाती है ! फिर आकाशवाणी सुकन्या के सत की रक्षा के लिए सुकन्या को क्या कहती है |

जवाब:- आकाशवाणी का।

(22)

आई आवाज गगन मार्ग से, सुकन्या डरिए मतन्या,
नहीं पिछाणै मनुष देव नै, इतणै तू वरिये मतन्या ।। टेक ।।

सुरग लोक तै आए देवते उनकी अदभुत माया सै,
पलक झिमै ना, आवै पसीना, कंचन कैसी काया सै,
नहीं जमीं पै स्पर्श होता, नहीं किसी कै छाया सै,
बुढ़ा-ठेरा तेरा पति था नौजवान बणाया सै,
इन तीना मै तेरा पति, तू भूलकै बिसरिये मतन्या।।

मृत लोक के बन्दे सबकी भोली सुरत मंद मती,
पलक झिमै और आवै पसीना, सबकै छाया देख सती,
होए तीन आदमी एक शक्ल के परमेशर की परमगती,
सतमुखी घोड़ा देख लक्ष्मी, भूल गई थी होश कती,
घोड़ी बणी हरि नै त्यागी, इसी खूद चरिये मतन्या।।

सूली पै यम वरुण लटकज्या जै धर्म छोड़दे सुकन्या,
कामदेव भी शिश पटकज्या जै धर्म छोड़दे सुकन्या ,
काल बली कै शान खटकज्या जै धर्म छोड़दे सुकन्या,
सूर्य का भी अरथ अटकज्या जै धर्म छोड़दे सुकन्या,
सत् अजमावै तेरा देवते, चक्कर मै गिरिये मतन्या ।।

इन तीनों मै तेरा पति कौणसै कै घालै माला सै,
बुढें तै जवान बणा दिया कौण पिछाणन आला सै,
सत् छोडे सत जा पत्नी, पति नै त्यागै चाला सै,
पति नै छोड़ और नै वर ले, मुहं दरगाह मै काला सै,
राजेराम इसी गलती तै फेर कदे करिये मतन्या ।।

वार्ता:-
सज्जनों! फिर सुकन्या सत पे रहते हुऐ आकाशवाणी के बताये मार्ग पर चलकर अपने पति चमन ऋषि को पहचान लेती है और फिर सुकन्या उन अश्वनी कुमार देवों से उनका परिचय और उनके आने का कारण पुछती है। फिर अश्वनी कुमार देव अपना परिचय देते हुए तथा अपने आने कारण बताते हुए सुकन्या को क्या कहते है !

जवाब:- अश्वनी कुमार का जवाब।

(23)

सुर्य के पुत्र अश्वनी-कुमार म्हारा नाम सुकन्या हे,
आए परीक्षा लेण छोड़के सुरग धाम सुकन्या हे ।। टेक ।।

विश्वकर्मा कै दो लड़की थी, नाम था संज्ञा और छाया,
ब्रह्मा की आज्ञा तै ब्याहकै सूर्य देवता लाया,
छाया का सारवणी मनु होया और शनि देवता जाया,
संज्ञा कै तप्ती कन्या यम होया यमलोक जिसनै पाया,
लख चैरासी जियाजुन ओेड़ै तपै तमाम सुकन्या हे।।

सूर्य जी की तप्ती कन्या स्वर्ण राजा कै ब्याही हे,
संज्ञा नारी घुमण चलकै बियाबान मै आई हे,
घोड़ी रूप धार लिया दिन मै रात नै बणी लुगाई हे,
अश्वनी-कुमार होए पुत्र दो, वे थे जोड़ले भाई हे,
सुर्य देव बण्या था घोड़ा, होई शाम सुकन्या हे।।

इन्द्रलोक सुरग मै जुड़री थी महफिल सारी,
ब्रह्मा विष्णु आए थे उड़ै शिवशंकर भण्डारी,
बोली पार्वती सुकन्या सै पतिभ्रता नारी,
आए सुरग तै लेण परीक्षा हाम सुकन्या थारी,
तू सब तरियां हामनै पाई, धर्म पै कायम सुकन्या हे।।

तनै अतिथी समझकै राख्या आदरमान हमारा,
देवत्या के सै डाक्टर आयुर्वेदी ज्ञान हमारा,
तेरा बुढ़ पति जवान बणा दिया सै इम्तिहान हमारा,
अश्वान-दधिची तेरै दो पुत्र हो यो वरदान हमारा,
साची बात बतावण लाग्या राजेराम सुकन्या हे।।

वार्ता:-
सज्जनों ! अश्वनी-कुमार सुकन्या व चमन ऋषि को अपना सारा परिचय बताते है और सुकन्या को कहते है कि हम स्वर्ग लोक मे माता पार्वती से तेरे सतीत्व और पतिव्रता धर्म का जिक्र सुनकर तेरे सती और पतिव्रता धर्म कि परीक्षा लेने आये थे जिस पर तुम कायम रही | फिर अश्वनी कुमार कहते है कि हम तेरे इस सती और पतिव्रता धर्म से खुश होकर तुमको दो पुत्र रत्नों का वरदान देते है | फिर अश्वनी कुमार सुकन्या दो पुत्रों का वरदान देकर और चमन ऋषि को बूढ़े से जवान करके स्वर्गलोक चले जाते है ! फिर इस प्रकार चमन ऋषि बूढ़े से जवान हो जाता है और खुश होकर सुकन्या से क्या कहते है।

जवाब:- चमन ऋषि का।

(24)

शिवजी भोले की दया, कोए दुखी ना रह्या,
भगतो का रखवाली, भगवान हो गया ।। टेक ।।

विश्वेनाथ सच्चा है शंभू काशी का वासी,
दीनदयालु है कृपा सिंधू अविनाशी,
कैलाशी डमरू वाला, गल मै सर्पो की माला,
ज्वाला मां शेरावाली का भी ध्यान हो गया।।

चांद मस्तक पै बिराजै, लटा मै गंगे बहता पाणी,
गणेश की माता गौरी जगदम्बा कल्याणी,
भवानी माता पार्वती की, चेली तू सौकन्या सती,
पति बुढ़ा तत्काली जवान हो गया।।

देवत्यां नै अमृत बांटया, आपनै घूंट भरी विष की,
दिए दस शीश रावण को, थी सोने की लंका उसकी,
जिसकी लौ लागी हर मै, फिरया ना धन के चक्कर मै,
रही ना घर मै कंगाली, वो धनवान हो गया।।

मांगेराम पाणची मै रहै था गाम सुसाणा,
कहै राजेराम गुरू हामनै बीस के साल मै मान्या,
सरहाना सुणकै नै छंद की, खटक लागी बेड़े-बंद की,
लख्मीचंद की प्रणाली का, इम्तिहान हो गया।।

वार्ता:-
सज्जनों! फिर इस तरह सुकन्या और चमन ऋषि कि शादी को 12 वर्ष बीत जाते है ! फिर उधर अवधपुरी में महाराणी को अपने बेटी सुकन्या सुपने में दिखाई देती है और महारानी राजा शर्याति को अपने महल में बुलाकर राजा को सुकन्या वाला सुपने का हाल बताकर महारानी क्या कहती है |

जवाब:- महाराणी का राजा से।

(25)

रात सुकन्या दिखी सुपने मै राणी नै,
भूप बुलाया रंगमहल मै ।। टेक ।।

न्यूं बोली फेटण चाल पिया, होगे 12 साल पिया,
दे टाल पिया, कोण कर्मा की हाणी नै,
भूल करी ना सोची पहल मै।।

साजन लगै हेरवे मां कै, जणुं तै इब फेटलूं जा कै,
आए थे ब्याह कै, बण मै बेटी याणी नै,
बुढ़े पति की गैल मै।।

बुढ़ा पति कन्या उम्र की थोड़ी, बणादी भेमाता नै जोड़ी,
आंख ऋषि की फोड़ी, उस मरजाणी नै,
न्यूं फिरैगी बण की सैल मै।।

राजेराम मार हो सुर की, मनै तो श्रुति लाली धुर की,
याद करे जा नै, सतगुरू की बाणी नै,
ज्ञान लिया था टहल मै।।

वार्ता:-
सज्जनों! फिर महारानी सुपने का हाल बताकर राजा शर्याति को कहती है कि मुझे अचानक अपनी बेटी का सुपना देखकर मेरे को सुकन्या की बहुत याद सता रही है और वैसे भी हमको अपनी बेटी सुकन्या से मिले हुए 12 साल हो गए है तथा हर माँ बाप का फर्ज बनता है कि हमेशा अपनी संतान को संभालना चाहिए | फिर राजा शर्याति महारानी कि बात सुनके राजा शर्याति और महाराणी, मंत्री, सेना व दासी-दास सहित चमन ऋषि के आश्रम में आ जाते है। जब सभी वहां पे पहुंचे तो चमन ऋषि की कुटी की जगह वहां पर महल-मकान, मंदिन-धर्मशाला आदि बने हुए थे और संत महात्मा भी डटे हुए थे | यह सब देखकर राजा सोच में पड़ जाते है क्युकि उनको चमन ऋषि जी और उनका आश्रम भी नहीं दिखाई दिया | फिर राजा महलों और मंदिरों कि तरफ आगे बढ़े तो उनको एक नौजवान लड़का व सुकन्या दिखाई देती है और राजा सुकन्या से पूछता है कि तेरा पति चमन ऋषि कहाँ है तथा ये जवान लड़का कौन है लेकिन सुकन्या कुछ भी नहीं बोलती है। फिर राजा उस नौजवान लड़के चमन ऋषि से पूछते है कि तुम कौन हो और यहाँ क्या कर रहे हो | फिर नौजवान चमन ऋषि राजा को बताता है कि मै ही इनका पति चमन ऋषि हूँ तथा फिर चमन ऋषि अपने 12 साल की पूरी घटना राजा को बताते है लेकिन राजा को उस जवान नौजवान लड़के चमन ऋषि की बात पर विश्वास नहीं होता है | फिर राजा शर्याति गुस्से में होकर अनजाने में उस जवान लड़के चमन ऋषि को क्या कहते है |

जवाब – राजा शर्याति का |

(26)

इस छोरे की बात गात मै, मेरै समाती कोन्या,
अवधपुरी का भूप सुण्या के, तनै शर्याती कोन्या ।। टेक ।।

नदी नर्मदा कै धोरै था चमन ऋषि का डेरा,
नौजवान होया किस तरिया ऋषि था बुढ़ा ठेरा,
बहरूपिया इंसान दिखता नहीं जमाई मेरा,
ना शर्म ल्हाज बड़े-छोटे की ना बोलण का बेरा,
छोटी बात सभा मै कहदे वो पंचाती कोन्या।।

वेद-पुराण, शास्त्र-नीति, कांड-क्रम ना जाणै,
आठ योग और मनु स्मृति ना चार आश्रम जाणै,
अग्निहोत्र, पंच महायज्ञ, परमोधरम ना जाणै,
भृंगु संगीता, उपनिषद्, गायत्री, ईष्ट ब्रहम ना जाणै,
शिक्षा, कल्प-व्याकरण, ज्योतिष का वो ब्रहामण ज्ञाती कोन्या।।

14 विद्या, 6 नीति जाणै छत्री के कादे,
राग-रसान, नृत-नटबाजी, नटकला दिखादे
कुश्ती जीतै, गदा घुमावै, रथ हाँकै, तीर चलादे
हीणे का साथी ठाडे गेल्या रण मै तेग बजादे,
यो कितका रजपूत, चढ़या कदे घोड़ा हाथी कोन्या ।।

बिक्या हरीशचंद कांशी मै मदनावत गैल बताई,
सावत्री सत्यवान पति नै आप ढूंडकै ल्याई,
पति-पत्नी जीवन के साथी हो बिन प्रेम लड़ाई,
सुकन्या गयी भूल पति नै चमन ऋषि कै ब्याही,
राजेराम प्रेम का बासी, प्रेम कै जाति कोन्या ।।

वार्ता:-
सज्जनों! राजा शर्याति अनजाने मे गुस्से से आग बबूला होकर चमन ऋषि को नहीं पहचानता है तथा चमन ऋषि को बहरूपिया समझता है। फिर राजा अपनी लड़की सुकन्या और जवान लड़के चमन ऋषि की बुराई करके सुकन्या को भी धमकाता है तथा उसको भी खरी-खोटी सुनाता है | राजा तलवार उठा लेता है और कहता है कि आज मै इस नौजवान लड़के को मारूंगा लेकिन इतनी देर मे राणी राजा का हाथ पकड़ लेती है क्यूकि रानी को अपनी बेटी सुकन्या के सती और पतिवर्ता धर्म पे विश्वास था और राजा को क्या समझाती है।

जवाब:- राणी का राजा से।

(27)

निर्बल नारी, नाबालक पै, छत्री नहीं चढ़ाई करदे,
मात-पिता, बेटा-बेटी की, कदे नहीं बुराई करदे ।। टेक ।।

या बेटी तू इसका बाप, डूबग्या साजन आपणै आप,
सौकन्या का खोट माफ, तूू मेरी नंणद के भाई करदे,
आच्छे लागै नहीं लड़ाई, सुसरा और जमाई करदे।।

बेटी तै ल्यूंगी बूझ बात मै, पहलाए ठाली तेग हाथ मै,
जिसकै होज्या बहम गात मै, उसकी कोण दवाई करदे,
ओले लागै भाग फूटज्या, किमे दाता करड़ाई करदे।।

पहले हो घरबारी कै टोटा, होज्या साहुकार धन मोटा,
अपणे मुहं तै माणस छोटा, आपणी आप बड़ाई करदे,
मुर्ख सेती मुर्ख माणस, खाम-खा लड़ाई करदे।।

जलता कोन्या धर्म आग मै, फर्क सै कोयल और काग मै,
बितैगी जो लिखी भाग मै, चाहे कितणिए चतुराई करदे,
राजेराम कहै न्याकारी, चोड़ै झूठ-सच्चाई करदे।।

वार्ता:-
सज्जनों ! राजा शर्याति अपनी महरानी के समझाने पर भी नही मानता है और न ही अपनी बेटी सुकन्या पर विश्वास करता है | फिर राजा भी ज्यादा गुस्से मे हो जाता है और कहता है कि जब हम यज्ञ हवन करने आये थे तब तो चमन ऋषि एक कुटी मे रहते थे और आस पास बियाबान जंगल था तथा अब तो यहाँ बाग-बगीचों मे महल हवेली और मंदिर शिवाले बने हुए है | इस प्रकार राजा यह सब नया नया देखके एक बार फिर सोच विचार मे पड़ जाता है तथा अपनी बेटी सुकन्या से इस बारे में पूछने लग जाता है लेकिन सुकन्या कुछ नहीं बोलती है और बिल्कुल मौन रहती है | इस प्रकार फिर से राजा के मे मन मे अशांति के भाव उत्पन्न हो जाते है और एक बार फिर तलवार उठाकर चिंता चिंता मे क्या कहता है |

जवाब:- राजा का ।

(28)

अवधपति राजा शर्याति करणे लाग्या सोच-विचार,
सूकन्या कै धोरै देख्या छैल छबिला राजकुमार ।। टेक ।।

पहले भी इस बण मै आए, भूप नै यज्ञ आरम्भ करवाए
बहती नदी नर्मदा वाहे, परमजोत सै गंगे धार,
साधू-संत, महात्मा-योगी, दुनिया के नहावै नर-नार।।

चमन ऋषि था बुढ़ा ठेरा, यो सै ना जमाई मेरा,
डेरा, था उड़ै महल-हवेली होए चैबारे झाकीधार,
बाग बगीचे कुए बावड़ी, शिव का मंदिर खुले द्वार।।

सुकन्या चमन ऋषि कै ब्याही, कोन्या इसनै टहल बजाई,
गैर-पुरूष तै प्रित लगाई, त्याग दिया अपणा भरतार,
डूब गई सुकन्या बेटी, हामनै के थुकै संसार।।

उम्र जवान शान का गौरा, दिखै भूप का छोरा,
राजेराम बावला होरया, बोलै सै करके अहंकार,
इस लड़के नै मै मारूंगा, राजा नै ठाई तलवार।।

वार्ता:-
सज्जनों ! राजा शर्याति एक बार फिर उस नौजवान लड़के चमन ऋषि को मारने के लिए तैयार हो जाता है लेकिन रानी फिर राजा को समझाती है और राजा का हाथ पकडके राजा को रोक लेती है | इसके बाद महारानी फिर सुकन्या से स्वयं इस सारे वृतांत के बारे में पूछती है लेकिन सुकन्या फिर भी मौन रहती है और रानी को कोई जवाब नही देती है | जब सुकन्या महारानी को भी जवाब नही देती है तो महारानी भी असमंजस में फंस जाती है और सुकन्या के पतिव्रता धर्म को संशय के घेरे में ले लेती है और कहती है कि हम तुमसे आज 12 साल में तो मिलने आये है लेकिन तुम तो हमें देखकर खुश भी नहीं हो और हमारे बोलने पर भी कोई उतर नही दे रही हो तथा ऊपर से ये नौजवान लड़का हमें दिल दुखाने वाली बात कह रहा है | इस प्रकार राणी फिर भली-बुरी सुनाती हुई सुकन्या से क्या कहती है।

जवाब:- राणी का।

(29)

मेरी सुकन्या जाई, तू ना बोली बतलाई,
12 साल मै फेटण आई, पिता गैल तेरी मां ।। टेक ।।

तू याणी थी सुकन्या और ऋषि था बुढ़ा ठेरा,
छैल-छबिला छोरा दिखै यो पति नहीं सै तेरा,
यो मेरा नहीं जमाई, तू चमन ऋषि कै ब्याही,
कोन्या उसकी टहल बजाई, दिया तनै धोखा।।

यो कहै दर्द की बात कंवर ना तेरे पिता तै झलती,
तू कोन्या भेद बतावै या सुकन्या तेरी गलती,
मिलती नहीं दवाई, जिब मारै चोट कसाई,
जिंदगी सारी भरता नाहीं, इसा बोल का घा।।

खुशी होई ना सुकन्या तनै महारै सेती मिलकै,
ले कुटुम्ब साथ हाम आए सा अवधपुरी तै चलकै,
तनै कुल कै लादी स्याही, तै गैर पुरूष नै ल्याई,
मालिक जाणै झुठ सच्चाई, दरगाह मै हो न्या।।

सूर्यवंशी अवधपुरी का यो राजा शर्याति
इज्जत-धर्म ना मान-मर्यादा लोक-ल्हाज ना चाहती
जाती नहीं बताई, तनै थुकै लोग लुगाई,
राजेराम बुराई-भलाई, लेकै दुनिया जा।।

वार्ता:-
सज्जनों! फिर सुकन्या को धमकाते हुए राजा और रानी दोनों भली बुरी और खरी खोटी सुनाते है तो फिर सुकन्या अपने माता-पिता को उनकी शादी के बाद बीते 12 वर्षो का वृतांत सुनाती है और सुकन्या रोती हुई अपनी माता से क्या कहती है।

जवाब:- सुकन्या का।

(30)

सुण मात मेरी, तनै साची बात बताऊं ।। टेक ।।

बुढ़े गैल ब्याही माता उम्र की नादान मै,
पति की करूं थी सेवा सोचके भगवान मै,
12 साल बितगे जंगल बियाबान मै,
परीक्षा लेवण सूर्य पुत्र अश्विनी-कुमार आगे,
कुटी पै ठहरण नै भेष ब्राहमण का धार आगे,
पिया बोले दो अतिथी आज तेरै द्वार आगे,
मै बोली अस्नान करो तुम भोजन इब बणाऊं।।

नर्मदा नदी मै नहाण पिया भी गए थे साथ,
आंख तै भी अंधा पति पकड़कै नै चाले हाथ,
तीर्थ के मै न्हाके उसका स्वर्ण कैसा होग्या गात,
कुटीया पै आए तीनों छैल-छबिले राजकुमार,
देखके नै सहम गई मैै याणी सुकन्या नार,
न्यूं बोले तै हामनै वर ले बुढ़ा सै तेरा भरतार,
पड़ी धर्म संकट मै, माता कैसे धर्म बचाऊं।।

किस तरियां पिछाणुं पति बुढ़े तै जवान होगे,
तीन आदमी एक शक्ल के देखणिये हैरान होगे,
ब्रहमा-विष्णु-शिवजी तीनों प्रकट जैसे आण होगे,
दीनबंधु-दीनानाथ तेरे हाथ मेरी लाज,
करूणा के निधान राखों सति की प्रतिज्ञा आज,
अग्नि-यम-वरूणदेव के आगे इन्द्र महाराज,
करण लागी स्तुति, प्रभु इब बता कित जाऊं।।

होई थी आकाशवाणी देवतां की अदभूत माया,
पलक झिमै ना आवै पसीना किसे कै ना होती छाया,
देवत्यां नै आके मेरा सत भी अजमाणा चाह्या,
मृतलोक के बंदे इनकी मंद मति भोली शान
अस्तुति करण लागी देवता होगे दयावान
तीनुवां मै पति तेरा सुकन्या तू ले पिछाण,
कहै राजेराम या कथा पुराणी, मां तनै आज सुणाऊं।।

वार्ता:-
सज्जनों! सुकन्या ने फिर अपनी सारी कथा माता-पिता को सुणाई लेकिन फिर भी सुकन्या की बात का राणी व राजा को पूर्ण विश्वास नहीं होता है | फिर राजा कहता है कि बेटी सुकन्या हमें पूर्ण विश्वास जब होगा जब ये जवान लड़का चमन ऋषि अपने पुराने इतिहास के बारे बताते हुए अपनी वंशावली से हमें ज्ञात कराए | फिर इस प्रकार फिर जवान लड़का चमन अपने सास-ससुर को विश्वास दिलाने के लिए एक ज्ञानी ध्यानी ऋषि का परिचय देते हुए अपनी वंशावली और ब्राह्मणों के गोत्रो व शासनों पे प्रकाश डालते हुए राजा और रानी से क्या कहता है।

जवाब:- चमनऋषि का।

(31)

28 गोत ब्राहम्ण सारे, ध्यान उरै नै करणा सै,
गृहस्थ-आश्रम पति-पत्नी का, धर्म सनातन बरणा सै ।।टेक ।।

सतयुग मै 56 शासन, त्रेता में 103 होए
12 राशि गोत 27, 28 जमीन होए,
जिनके गोत्र ना जाणे वे ब्राहम्ण विद्याहीन होए,
दान-पुन्न, यज्ञ-हवन, तपस्या-भक्ति कै अधिन होए,
खुद भगवान भगत के बस मै, फेर बता के डरणा सै।।

मुनी वशिष्ठ, अंगीरा, कश्यप, दुनिया के सरताज ऋषि
गालिब, किरतस, गौतम, अत्री, अगस्त, भारद्वाज ऋषि,
चांदराण, पिपलाण, पुलस्त, याजु और पियाज ऋषि,
कौशिक भूप होए विप्र गांधी विश्वामित्र राज ऋषि,
वत्स, वियोग, हरितस गोत्र मुद्गिल और सोपरणा सै।।

हरित, साण्डल और साकीरत, जमदगनी के परशुराम,
होन्ग, शेषवर, कृष्णा त्रिये, गोत्र होए कृष्णा शाम,
सोहनक ऋषि पाराशर गोत्र, जिसनै पढ़ लिए वेद तमाम,
ब्रहम ऋषि भृंगु के बेटे चमन ऋषि है मेरा नाम,
वंशावली ब्राहमण कुल की सुणकै पेटा भरणा सै।।

जम्बुदीप, भरतखण्डे, आर्यवर्त थे ब्रहामण सारे,
विष्णु विशवे ब्रहम देवता जगतगुरू बुध और तारे,
ईश्वर व्यापक जड़ चेतन मै माया ब्रह्म जीव धारे,
चार बेद, छः शास्त्र नै दिए छाण दूध-पाणी न्यारे,
राजेराम कहै अग्नि का मुख, ब्राहमण प्रथम चरणा सै।।

वार्ता:-
सज्जनों! जब चमन ऋषि अपनी वंशावली और ब्राह्मणों के गोत्रो का विस्तारपूर्वक वर्णन करता है तो राजा शर्याति और राणी को पूरा यकीन हो जाता है कि ये वही चमन ऋषि है जिससे हमने अपनी बेटी सुकन्या की शादी की थी | फिर राजा और रानी चमन ऋषि के कर्म से और सौभाग्यवती सुकन्या के पतिव्रता धर्म से खुश होकर उस प्रभु कि अदभुत माया का बखान करते हुए क्या कहते है |

जवाब:- राणी का।

(32)

तेरा देख्या भाग सुकन्या बेटी, सुखी मेरा जीवन होग्या,
तेरा पति जवान शान का, बुढ़ा ऋषि चमन होग्या ।। टेक ।।

प्रजापति का रूप पिता, पृथ्वी का मात जन्म आली,
धर्म पिछाणै तै रूप दया का, धी बेटी कन्या बाली,
पूत परम का सार जगत मै, जिसतै अगत-बेल चाली,
यो जगत बाग सै जड़-चेतन का, जगतपिता इसका माली,
ब्रहम से जीव, जीव से माया, बाग सूख चेतन होग्या।।

शक्ति से आकाश रचा दिया, जगत पिता अंतरजानी,
वायू तेज, तेज से अग्नि, गगन मै तै उपज्या पाणी,
रवि-राकेश धूप-छाहँ करते, होया ओमकार शब्दवाणी,
पाणी पै फूल, फूल पै ब्रहमा, रच दिया जगत परमज्ञानी,
पाणी मै तै उपजी धरती, धरती मै तै अन्न होग्या।।

मोह-माया से मिथुन सृष्टि, लगा दिए मरणे जीने,
घटण बढ़ण का दोष चांद कै, 27 नक्षत्र भोग जिन्हें,
12 सूर्य, 12 राशि, 1 साल, 12 महीने,
64 घड़ी और 8 पहर, 24 घण्टे कर दिन्हे,
4 पहर की रात बणादी, 4 पहर का दिन होग्या ।।

सागर मै तै उपजी लक्ष्मी, वर विष्णु भगवान लिया,
विष्णु जी नै त्याग दई थी, घोड़ी बणी श्राप दिया,
शिवजी-पार्वती बोले, तेरे पुत्र हो जब मिलै पिया,
होया लड़का त्रिशु, राजा की राणी नै वो पाल लिया,
राजेराम कहै वो लड़का, सहस्त्रबाहु अर्जुन होग्या।।

वार्ता:-
सज्जनों! फिर राजा हाथ जोड़के चमन ऋषि से माफी मांगते हुए कहता है कि हे ऋषि देव मैनें अपनी संतान के मोह में फंसकर अनजाने में मै आपको पहचान नहीं सका | फिर राजा शर्याति कहते है कि हे ऋषि जी आप तो साक्षात् भगवान के रूप हो और आप त्रिकालदर्शी हो। फिर राजा प्रार्थना करते हुए चमन ऋषि से कहता है कि मै 12 साल पहले भी यहाँ पुत्र रत्न के लिए आया था लेकिन उस समय तो मेरा यज्ञ भंग होने से मुझे पुत्र प्राप्त नहीं हुआ और प्रभु की उस अदभुत माया से मुझे आप जैसे जमाई के रूप में पुत्र प्राप्त हो गया | इसलिए मै आपने विनती करता हु कि मेरी भी वंशबेल चलाने के लिए आप मुझे भी पुत्र का वरदान दीजिये। फिर राजा कि पुकार सुनके चमन ऋषि कहते है कि आप पुत्रेष्ठी यज्ञ आरम्भ कराईए। राजा ने फिर यज्ञ आरम्भ करवाया तो इन्द्र आदि देवता आ जाते है फिर बाद में यज्ञ में भाग लेने के लिए जब अश्वनी कुमार आते है तो इन्द्र कहता है कि इनको यज्ञ में भाग नहीं दिया जाए क्यूंकि ये देवतओं के चिकित्स है और इन दोनों का पशुओ का मुख भी है इसलिए एक चिकित्स और पशुओ का यज्ञ मे भाग लेना वर्जित है लेकिन चमन ऋषि ने इन्द्रदेव कि बात को इन्कार करते हुए कहते है कि ये तो सूर्य के पुत्र है इनको तो यज्ञ में भाग मिलना ही चाहिए। उस यज्ञ में जब अश्वानी-कुमारों को भाग दिया जाने लगा तब देवराज इन्द्र ने फिर आपत्ति की कि अश्वनिी-कुमार देवताओं के चिकित्सक हैं, इसलिये उन्हें यज्ञ का भाग लेने की पात्रता नहीं है। किन्तु च्यवन ऋषि इन्द्र की बातों को अनसुना कर अश्वीनी-कुमारों को सोमरस देने लगे। इससे क्रोधित होकर इन्द्र ने उन पर वज्र का प्रहार किया लेकिन ऋषि ने अपने तपोबल से वज्र को बीच में ही रोककर एक भयानक राक्षस उत्पन्न कर दिया। वह राक्षस इन्द्र को निगलने के लिये दौड़ पड़ा। इन्द्र ने भयभीत होकर अश्वरनी-कुमारों को यज्ञ का भाग देना स्वीकार कर लिया और च्यवन ऋषि ने उस राक्षस को भस्म करके इन्द्र को उसके कष्ट से मुक्ति दिला दी। फिर चमन ऋषि जी इंद्रा देव को समझाते है और फिर इन्द्र को ऋषि की बात माननी पड़ी। अश्वनी कुमारों ने यज्ञ में भाग लिया और राजा शर्याति को तीन पुत्रो का वरदान प्राप्त हुआ | इस प्रकार फिर राजा शर्याति को तीन पुत्र हुए और दो पुत्र सुकन्या को हुए, एक आशवान और दूसरा दधिचि। । इस प्रकार लोमश ऋषि फिर कथा का अंतिम वर्णन करते हुए कहते है कि सुकन्या जैसी पतिभ्रता भी लड़की इस ब्रह्माण्ड में हुई, जिसने पतिभ्रता धर्म और तप से 88 वर्ष के आँखों से अंधे चमन ऋषि को उसने 18 साल का जवान बणा लिया था। यह कथा यहां पर समाप्त हुई।

।। बोल जय श्री कृष्ण की ।।

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