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*”समाज निजता में बाधक है”*

Dr. Mahender Singh

Dr. Mahender Singh

कविता

September 23, 2017

मैं कह न सका,
हिचक मेरे मन में थी,
वह सह न सकी,
काफ़िर
कह आगे बढ़ गई,
मन उसको भी था,
शर्म औरत के सोलह श्रृंगार का हिस्सा है,
वह भी हिचक गई,
न मैं जी सका,न उसे मौत आई,
.
यह मेरे समाज का बंद आईना है,
हमारी रीति रिवाज परम्परा जिंदा रहनी चाहिए,
“मुर्दा तैरता है,जिंदा आदमी डूब जाता है”

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Author
Dr. Mahender Singh
(आयुर्वेदाचार्य) शौक कविता, व्यंग्य, शेर, हास्य, आलोचक लेख लिखना,अध्यात्म की ओर !

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