कविता · Reading time: 1 minute

समाज का निर्माण

एक अकेला इंसान था
भूख प्यास से बेहाल था
ना प्रेम था ना एहसास
दारुण वृक्ष के समान था ।

एक एक मिलते गये
प्रेम एहसाह बनने लगे
रिस्तों की श्रंखलाएं बनी
और समाज का निर्माण हुआ ।

योग्यताऐं निखर रहीं थी
कार्य निर्धारण हो रहा
हर कोई चाहता था
उद्दोग में आहुति दे रहा था ।

प्रेम सम्बंध बढ़ रहे थे
माँ-बाप से आगे निकल रहे थे
हर कोई जिम्मेदार हो रहा था
समाज का निर्माण हो रहा था ।

कुछ विचारशील थे
कुछ शक्तिमान थे
कुछ कार्यकुशल थे
कुछ सेवा में सहनशील थे ।

कुछ आलसी थे
कुछ लालची थे
कुछ निकृष्ट थे
ये राजनीति से घनिष्ठ थे ।

फिर एकसाथ सब आगे बड़े
सुख दुःख साथ सहते चले
कुछ आगे निकल गए
कुछ वहीँ वस गये ।

समाज से प्रदेश बने
प्रदेश से बने देश
और बना संसार
राजनीति ने मचा दिया इसमें हाहाकार ।

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Working as Govt. Pharmacist In Delhi. मैं कुछ नही, सिवाय चलती-रूकती आत्मा के । इस जन्म मेरा, सामाजिक लिवास सोलंकी प्रशांत है ।। ना नाम हुआ, ना बदनाम हुआ ।…
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