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*समाज और अस्तित्व का मूल है बेटी !

Dr. Mahender Singh

Dr. Mahender Singh

कविता

November 10, 2017

*किसी युगल को सिर्फ बेटियां पैदा
हो रही हो अगर,
अकेले औरत नहीं है.. जिम्मेदार !
जाने कब होंगे ..लोग समझदार ?

शादी से पहले ही पढ़ लेना ये पाठ जरूर,
बेटियां पैदा नहीं होती अगर !
कैसे बढ़ पाता आपका घर-परिवार ?

करती है हर बेटी कुल का उद्धार,
प्रकृति है जननी है बेटी तेरा ओर न छोर,
सबकी नजरें है तेरी ओर,

हुआ क्यों ? फिर ऐसा !
जो जाँच शुरू हुई गर्भ में ही बेटी है ! के बेटा !

बेटी फूल है काँटा समझ लिया,
हर चेहरे की मुस्कान है बेटी..भार समझ लिया,
आँखों का तारा है बेटी …सुनसान समझ लिया,
हर घर में गूँजते स्वर है बेटी !
हर रस्म-रिवाज का मूल है बेटी !
फिर क्यों ?
फिर क्यों व्यर्थ ही बदनाम है बेटी !
माँ का सार्थक आँगन,
और आँचल है बेटी !
इस समाज और अस्तित्व का मूल है बेटी!
***समाज और अस्तित्व का मूल है बेटी!

डॉ महेन्द्र सिंह खालेटिया,
रेवाड़ी(हरियाणा).

Author
Dr. Mahender Singh
(आयुर्वेदाचार्य) शौक कविता, व्यंग्य, शेर, हास्य, आलोचक लेख लिखना,अध्यात्म की ओर !
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