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==* समशान नजर आता है *== (गजल)

SHASHIKANT SHANDILE

SHASHIKANT SHANDILE

गज़ल/गीतिका

August 31, 2016

जर्रा-जर्रा इस घर का समशान नजर आता है
दर-दिवार से आंगन सुनसान नजर आता है !

जी रहा हूँ मगर बेख़ौफ़ मैं रोज इस घर में
देख कर आईना दिल परेशान नजर आता है !

जाने पतझड़ सी लगे डाली क्यों खुशियों की
रूठा रूठा सा मुझको भगवान नजर आता हैं !

ना है कोई मंजिल और ना कुछ हासिल यहाँ
मेरे ही घर वजूद मेरा मेहमान नजर आता है !

गर मिला “एकांत” कभी इस घर के साये में
तो अपना भी कोई कदरदान नजर आता है !

रोज जीता है “शशि” क्यों डर के परछाई में
अपनें ही जिंदगी से वो हैरान नजर आता है !
——————–//**–
शशिकांत शांडिले (एकांत), नागपुर
भ्र.९९७५९९५४५०

Author
SHASHIKANT SHANDILE
It's just my words, that's it.
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