समय ठहर-ठहर सा गया

आवाजे रुकी-रुकी सी है…
चेहरा छुका-छुका सा है
बाते ठहरी-ठहरी सी है
अब रहना न किसी के साथ……..

समय बदल गया ऐसा…
आशा नहीं था ये तुमसे
अब न आना फिर तुम पास…
समय ठहर-ठहर सा गया

आंखे अब न रुकती है….
अब आंखे न झुक्ति है
अब रहना न किसी के साथ….
समय ठहर-ठहर सा गया

अब न जीना किसी के खातीर….
अब न मरना किसी के खातिर
स्वयं के खातिर जीना है….
मां बाप के खातिर मरना है

बदलने दो इन समय के पहियो को…..
अरमाने शायद जग जाए
चेहरा शायद उठ जाए
समय ठहर-ठहर सा गया

लेखक – कुँवर नितीश सिंह

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