" समय की शिला पर "

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समय की शिला पर मधुर चित्र कितने ,
किसी नें बनाए किसी नें मिटाए |
किसी ने लिखी आंसुओं से कहानी ,
किसी ने दिया किन्तु दो बूँद पानी ||

किसी नें छुआ मेरे मन के गहन को ,
सुगन्धित किया मेरे तन के चमन को |
सिखाया किसी नें बहारों में बहाना ,
चमन में महकना फिज़ा में बहकाना ||

सिखाया किसी ने था , छुप-छुप के मिलना ,
मिलन की घड़ी में भी , कुछ भी न कहना |
उड़ा दी थी नींदें , मेरी यामिनी की ,
सितारों से बातें , कराई किसी नें ||

किसी नें बनाया चकोरों की उपमा ,
सुगन्धित पवन से बदन का ज्यों मिलना |
मेरे मन के द्वारों के पट खोल उसने ,
बनाया मुझे एक झोंका हवा का ||

विचरता रहा मैं दिशाओं में दिग्भ्रम “
भ्रमित हो के जीवन की पगडंडियों में |
शरण न मिली एक पल की कहीं भी ,
जहाँ बैठ जीवन के सुख दुःख गुनता ||
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