समय की तेज धारा में

गीतिका (मात्रा १४ -१५ )
समय की तेज धारा में ,बहा जाता है मेरा मन।
फरेबी है जहाँ सारा ,कहाँ ढूढूं मैं अपना पन।

समय की दौड़ में भूला , मैं अपना आज हूँ यारो –
ठगा खुद को स्वयं ने ही,कहाँ है मेरा भोला पन।

मढ़ा है दोष औरों पर ,सदा अपनी बद-हाली का ,
मैं पुतला हूँ फरे’बों का ,कहाँ है मेरा सच्चा -पन।

फर्क है आसमां भर का ,मेरी कथनी-औ-कर’नी में ,
बनावट की धवल चादर ,छुपाती मेरा काला पन।

बाँग देता हूँ भीत पर ,चढ़ रोज़ प्रभात होने का ,
गुम हूँ खुद अंधेरों में ,कहाँ मेरा ऊजाला -पन।

दम्भ भरता हूँ औरों को, आईना दिखाने का पर –
नकाबों के छुपा पीछे, कहाँ देखूं मैं अपना-पन।

बहुरूप में दिखता मगर , कभी लालू- राजा बनकर –
‘अटल’ पूछे स्वयं से अब ;कहाँ फिर मेरा अपना-पन

2 Likes · 2 Comments · 8 Views
साहित्यिक नाम-अटल मुरादाबादी विधि नाम-विनोद कुमार गुप्त शिक्षा-बी ई(सिविल इंजी०) एम०बी०ए०,एम०फिल(एच आर एम) सम्प्रति -सरकारी...
You may also like: