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समयातीत

Neeraj Chauhan

Neeraj Chauhan

कविता

July 11, 2017

जीवन की वेदी पर
दुखाग्नि के हवन में
समय की आहुतियाँ
देता रहूँगा बार-बार

करता रहूँगा भस्मीभूत
तुम्हारे हर एक दारुण्य को
उठाऊंगा तुम्हे समय का हवाला देकर
बार बार..

डरना मत , मैं अभी हूँ
हाँ, चक्रव्यूहों में हूं
हाँ, कोरवों की सेना
मिलकर मुझे परास्त करेंगी
घेर लेंगी मुझे अकेला पा
हँसेगी , अठ्ठाहस करेंगी
उतारू होंगी, मेरे टुकड़े करने पर
मेरी दशा पर..

पल पल जब भी गिरूंगा
जब जब आंसुओ में मिल रक्त बहेगा
तब तब समय बाध्य करेगा
मुझे मरने को..

कोई आता है,
समयातीत
जो बहता है
मेरी धमनियों में .. शिराओं में
टूटे मेरे अस्थि पंजर मेरी भुजाओं में
मरते हुए भी जो जिन्दा रखता है मुझे
चुनौती दे देता है जो एक साथ
जो सैकड़ों कौरवों को,
जिसके सुदर्शन की छाया
ढाप लेती है संपूर्ण धरा को
मुझ सहित,
और फिर समय मुझे
बौना नज़र आता है..
मैं फिर जी उठता हूं!
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Author
Neeraj Chauhan
कॉर्पोरेट और हिंदी की जगज़ाहिर लड़ाई में एक छुपा हुआ लेखक हूँ। माँ हिंदी के प्रति मेरी गहरी निष्ठा हैं। जिसे आजीवन मैं निभाना चाहता हूँ।

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