कविता · Reading time: 1 minute

समयचक्र गति में

समयचक्र गति में तू भी चलता जा
लेके अपने हंसी सपनो को उड़ता जा
सूरज फिर ढल के कल उदित होगा
तेरे होंगे सपने साकार आगे बढ़ता जा

सूरज उदित हुआ है आई है नयी बेला
सूरज के साथ-साथ तू भी चलता जा
न होना पथ से विमुख मान के हार
नयी उत्साह के साथ आगे बढ़ता जा

आज मिला जो नहीं मिलेगा फिर कल
तू मंज़िल की ओऱ सरिता बन बहता जा
मिटा अपने अंदर से अज्ञानता की कालिमा
अपने ज्ञान की हर द्धार तू खोलता जा

धैर्य साहस से काम ले न हो निराश
धीरे-धीरे सफलता की सीढ़ी चढ़ता जा
समयचक्र गति में कमर कस ले अपना
मुश्किलो की सामना मुस्कुरा के करता जा

मेहनत से बनती है सबका भाग्य यहाँ पर
जो किया है उम्मीद उसे सच करता जा

लिखे जयेंगे फिर से एक नया इतिहास
ज़िन्दगी है रणभूमि योद्धा बन लड़ता जा

24 Views
Like
You may also like:
Loading...