समझे कैसे ....

समझें कैसे….
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भीतर कुछ
बाहर कुछ
दोगले
हो चुके व्यवहारों को
समझें कैसे ?
जो नहीं है वही
बढ़ा-चढ़ा कर दिखाने वाले
चोंचलें
बन चुके जीवन को
समझें कैसे ?
किसी के लिए जो सही
दूसरे के लिए वही सही नहीं
खोखले
हो चुके मानदंडों को
समझें कैसे ?
कर रहा हर कोई
खुश रहने की झूठी कोशिशें
टोटके
बन चुकी खुशी को
समझें कैसे ?
खो चुके आधार-मूल्य
पोपले
बन चुके समाज को
समझें कैसे ?
समझने के लिए क्या चाहिए ?
चाहिए बस एक ठोस आधार
करुणा का
समता -एकरूपता का
निर्मल झरना जो बहे
अंदर -बाहर निर्बाध-एकरूप
वास्तविक खुशियों भरा
सीधा ,सच्चा
सरल जीवन …
अनिता जैन ‘विपुला ‘

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