--सब बोलती हैं आँखें--दिक्पाल छंद

दिक्पाल छंद की परिभाषा और कविता–
दिक्पाल छंद
—————यह एक सममात्रिक छंद है।इसमें चार चरण होते हैं।प्रत्येक चरण की यति बारह-बारह मात्राओं पर होती है।इसके दो चरणों का तुकांत मिलना अनिवार्य है।चरणांत में दो गुरू मात्राएँ हों तो शोभनीय है।

दिक्पाल छंद की कविता “सब बोलती हैं आँखें”
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कुछ बातें न जुबां से,आँखों से होती हैं।
आँखें आइना बनें,चुप रहके कहती हैं।
दर्द छिपा ले न कभी,आवाज़ मौन बनती।
प्रेमी ही समझें हैं,रूह और न समझती।

आँखों से शुरू प्यार,आँखें खत्म करेंगी।
निडर बड़ी हैं चंचल,ये ना कभी डरेंगी।
हौंसला चाह भरती,चाहत की ये प्याली।
आँखें तो होती ही,नूर भरी मतवाली।

सपने देखें मीठे,मन को जो हैं भाएँ।
इनमें जो भी उतरें,उतरते घने जाएँ।
सच्चा कोई न यहाँ,जितनी हैं ये आँखें।
गंगा-सी हैं उज्ज्वल,प्यारी न्यारी आँखें।

करना दान ख़ुशी से,तुम गर दुनिया छोड़ो।
ये ना तोड़े नाता,तुम चाहो तो तोड़ो।
देखेंगी जग सारा,बनके उसकी चाहत।
दिव्यांग देखे जग,पाकर इनकी उल्फ़त।

अंगदान महादान,आशीष ख़ुदा का है।
प्रेरणा सभी की हो,ये धर्म सदा का है।
तुम ठहरे तो क्या है,ना ठहरेंगी आँखें।
सपनों का जाल नया,फिर बुन लेंगी आँखें।

आँखों का प्यार कभी,मरता नहीं जहां में।
होकर अमर गूँजता,मनहर जगत् फ़िजा में।
मानो आँखों की सब,धोखा कभी न होगा।
प्रीतम गिरो नज़र से,मौका कभी न होगा।

आर.एस.”प्रीतम”

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