**सब टूटे पड़े हैं**

ये दिल आखिर तोड़ता कौन है ?
यहाँ तो सब टूटे पड़े हैं,
बंद कमरों में तन्हा अकेले,
किसी ना किसी से रूठे पड़े हैं,
टूटी किसी की ख्वाहिशें, कुछ खुद बिखरे पड़े हैं,
कुछ सपनों को सजाये अब भी जिद पर अड़े है,
ये दिल आखिर तोड़ता कौन है?
यहाँ तो सब टूटे पड़े हैं।
चारों तरफ नजरें उठा के देखो,
हजार किस्से नए हैं,
कुछ पूरे हुए नग़मे, कुछ अधूरे पड़े हैं,
जख्मों को सिले कुछ, मरहम लगाए फिरे है,
उम्मीद का दामन पकड़े, आँसू छिपाये हुए हैं,
ये दिल आखिर तोड़ता कौन हैं?
यहाँ तो सब टूटे पड़े हैं।

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