कविता · Reading time: 1 minute

सब छोड़कर जाना है

काम कर पूरा
तुम यहाँ से चल दिए
बन्द कर आँखे
पलकें झुकाकर चल दिए
हम रह गये यही
तुम साथ छोड़कर चल दिए ।

ना रोकते हो
ना टोकते हो
बिगड़ रहे काम के
बारे में ना सोचते हो
हो गया पूरा काम
अब थक कर
सन्तुष्ट हो कर सो दिए ।

ये धन तुम्हारा
संपत्ति भी तुम्हारी
घर बार तुम्हारा
कमाया हर लम्हा तुम्हारा
बचाई हर पाई को
मैं की कमाई को
यहीं छोड़कर चल दिए ।

नही मिलोगे
अब दोबारा
ना ये देह होगी
ना ये चेहरा दुबारा
प्यार-नफरत के शब्द
हर शब्द मुँह में दबाकर चल दिए ।

बंद कर आँखे
पलकें झुका कर चल दिए……

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Author
Working as Govt. Pharmacist In Delhi. मैं कुछ नही, सिवाय चलती-रूकती आत्मा के । इस जन्म मेरा, सामाजिक लिवास सोलंकी प्रशांत है ।। ना नाम हुआ, ना बदनाम हुआ ।…
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