कविता · Reading time: 1 minute

सब्जी संग बहू पाई

******* सब्जी संग बहू पाई ********
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बेटा गया था बाजार, सब्जी भाजी लाने
ले आया सब्जी बनाने वाली माँ सिराहने

माँ घर में बैठी कर रही थी मसाला तैयार
सोचती थी बेटा आते करेगी सब्जी तैयार

निज हाथों से लिया था माँ ने आटा गूंथ
नहा धो कर उसने बाल भी लिए थे गूंथ

टकटकी दृष्टि लगाए थी द्वार पर मशगूल
बेटा ले आएगा सामान करेगी वो कबूल

जैसे -जैसे बेटे के आने में हो रही थी देर
माँ के मृदुल मन में विचारों में थी हेर फेर

बेटे के विलम्ब पर माँ को हो गई चिन्ता
माथे पर चढ़ी त्योरियां और छाई चिन्ता

यकायक द्वार पर हुई आगमन दस्तक
बेटे साथ देख लड़की खनका मस्तक

लड़की थी नीली जीन्स में विराजमान
माँ के देख उसे जैसे निकल रहें थे प्राण

माँ ने बेटे से पूछा यह क्या है कारनामा
सब्जी के साथ ये क्या उठा लाया ड्रामा

बेटे ने कहा माँ यह लड़की तेरी बहू है
जल्दी से तेल चो वह द्वार पर खड़ी है

माँ ने में तेल की जगह चिमटा उठाया
सुखविन्द्र को बहू समेत थाने पहुंचाया
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सुखविंद्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैथल)

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