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सबेरा

डा. सूर्यनारायण पाण्डेय

डा. सूर्यनारायण पाण्डेय

कविता

January 26, 2017

जब मन-मस्तिष्क,
सद की इक्छाओं से ओत-प्रोत हों,
भावनाएं, कामनाएं सब प्रभु को समर्पित हों
‘कर्म’ की निरन्तरता से
मन-मयूर झूम रहा हो
आगे, आगे और आगे
की भावना अन्तर में व्याप्त हो रही हो,
मेरे पथिक!
समझो वहीँ सबेरा है।
………
संसार की तथाकथित रीति-रिवाजों में,
जब मन बधा न हो,
नभ को छूने की ध्रुव इक्छा हो,
समस्त भौतिक कामनाएं/इक्छाएं
एक इंगित पर थम गईं हों,
न आश्रय की फिक्र हो न आश्रय देने की,
स्वतंत्रता के ऐसे बाग में
समझो सबेरा है।

Author
डा. सूर्यनारायण पाण्डेय
देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में 1000 से अधिक लेख, कहानियां, व्यंग्य, कविताएं आदि प्रकाशित। 'कर्फ्यू में शहर' काव्य संग्रह मित्र प्रकाशन, कोलकाता के सहयोग से प्रकाशित। सामान्य ज्ञान दिग्दर्शन, दिल्ली : सम्पूर्ण अध्ययन, वेस्ट बंगाल : एट ए ग्लांस जैसी... Read more
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