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सफीना

milan bhatnagar

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गज़ल/गीतिका

April 21, 2017

क्यों ग़मों मे बशर डूबता जा रहा है
फासला इंसानों में बढ़ता जा रहा है

मुल्क का जाने क्या अन्जाम होगा
नेतागिरी का पारा चढ़ता जा रहा है

कोई इसकी मुराद न हो पाएगी पूरी
जो पाँव चादर से निकला जा रहा है

तहजीब नाकाबिले-तारीफ़ हो रही है
पानी सरों से ऊपर उठता जा रहा है

संभल संभल कर रखना हर कदम
ये कही का कहीं फिसला जा रहा है

आसमां छूने की तमन्ना में हरेक
नीव का पत्थर उखड़ता जा रहा है

कश्तियाँ किनारे पहुचाने ‘मिलन’
तूफानों में सफीना घिरा जा रहा है !!

मिलन “मोनी” १३/4/२०१७

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Author
milan bhatnagar
बाल्यकाल से ही कविता, गीत, ग़ज़ल, और छंद रहित आधुनिक कविताएँ लिखना मेरा शौक रहा है कुछ गीतों को स्वर भी दिया गया है ! "गज़ल गीतिका" मेरा सम्पूर्ण संग्रह है

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