सफर

सफर में साथ चलने वाले
सभी तो नहीं होते हमसफ़र
सभी तो होते हैं
नितान्त,अजनबी
जिन से नहीं होता
कुछ भी परिचय
फिर भी
सफर में
ये बन जाते हैं
हम ख़्याल,हमसफ़र
और साथ बैठकर
बिता देते हैं
बहुत सा समय
साथ-साथ
उस वक़्त नहीं रहता खुछ भी ख़्याल
कि ये तो है मुसाफ़िर
आज इस सफ़र के
कल उस सफ़र के
फिर यूँ हीं पूरी उम्र निकल जायेगी
तब न होंगे ये…
न होंगी इनकी मीठी बातें…
सुनील पुष्करणा

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suneelpushkarna@gmail.com समस्त रचना स्वलिखित
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