"सपनों के खंडहर में "

सपनों के खंडहर में ,
एक लता बेल की,
आज लहरा रही है ,
अंतहीन उमंग में देखो|
साँझ की फैली है उदासी,
मगर,विहगों के कलरव हैं पुकारते ,
नीड़ की खोज में उडान हैं भरते,
भूलकर अपनी सब थकान को|
इन बेलों की भी है चाहत,
उड़ सकूँ कभी मैं खग बन,
नील गगन में कलरव भर,
गोधूली में खो जाऊँ |
अपने भी पर हों सुंदर ,
नहीं रहूँ मैं भी निर्भर ,
मेरी लता हो उन्मुक्त,
दूर देश की सैर करूँ |
नवल निशा का रस पी ,
मैं भी झूमूँ आनन्दित हो ,
भूल जाऊँ सच सारे ,
सपनों के खंडहर में |
…निधि…

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"हूँ सरल ,किंतु सरल नहीं जान लेना मुझको, हूँ एक धारा-अविरल,किंतु रोक लेना मुझको"
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