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सपनों की भूख में फर्जों से लिया मुख फेर

कृष्ण मलिक अम्बाला

कृष्ण मलिक अम्बाला

कविता

August 13, 2016

मैं नहीं हूँ औरत का विरोधी बहना
पर चाहता हूँ समाज से कुछ कहना
आज की औरत अपने फर्ज से मुख मोड़ गयी
नौकरी के चक्कर में बाकि चिंता छोड़ गयी
उसको बहन कैसे याद दिलाएं
पैसे से बड़े फर्ज का मोल
कैसे उसको आईना दिखाएँ
फर्ज होते हैं अनमोल
घर का गहना औरत कहलाती
तभी वो गृहणी कहि जाती
आदमियों ने भी लालच में उनको
पैसे के जाल में फैंक दिया
बन गयी चक्की पैसे की
बच्चों को अग्नि में सेक दिया
सोचना दोनों पक्षों को गहरायी से
आघात ना लेना मेरी लिखाई से
कहना ये सिर्फ चुनिंदा औरतों के बारे में
खुद में बहन मत ले लेना
हो भूल मेरे शब्दों से अगर
छोटा भाई कहकर माफ़ी दे देना
औरत को करता हूँ सलाम उनको
फर्ज की दिल से कदर है जिनको
नफरत है हर उस मर्द से
जिसके लिए वो दूर होती हैं फर्ज से
आने वाली पीढ़ी को बचाना है
उनको माँ से संस्कार दिलाना है
वो तभी सम्भव हो पायेगा
जब माँ के पास समय आ पायेगा
अभी हूँ लफ्जों का कच्चा खिलाड़ी
खेलनी है रस की लम्बी पारी written -04 /05 /2016
You may give your suggestion on email also- ksmalik2828@gmail.com

Author
कृष्ण मलिक अम्बाला
कृष्ण मलिक अम्बाला हरियाणा एवं कवि एवं शायर एवं भावी लेखक आनंदित एवं जागृत करने में प्रयासरत | 14 वर्ष की उम्र से ही लेखन का कार्य शुरू कर दिया | बचपन में हिंदी की अध्यापिका के ये कहने पर... Read more
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