सपना नहीं टूटा है मेरा

सपना नहीं टूटा है मेरा
और ना ही टूटी हूँ मैं
बस एक धुंध में खोई थी
तूफानों के बीच/

नहीं देख पा रही थी
मैं साफ़ साफ़
कौन सही है
और कौन गलत/

कभी कभी थोड़ी धुंध
हट रही थी आँखों से
और दिखाई दे रहे थे
कुछ धुंधले से रास्ते/

पर आंधियों के जोर के आगे
कहाँ चल रहा था मेरा बस
बहती जा रही थी मैं
बस यूँ ही हवा के विपरीत
खुद को सम्भाले
बिल्कुल अकेले/

थकती जा रही थी मैं
टूटती जा रही थी मैं/

फिर भी हार कहाँ मानी है मैंने
अपनी शक्तियों को समेटे
सपने पूर्ण करने के दृढ संकल्प के साथ
चलती जा रही हूँ मैं/

घायल अश्वों
टूटी तलवार के साथ
आँधियों से भिड़ती जा रही हूँ मैं/

इस विश्वास के साथ
कि आँधियाँ
और कब तक जोर दिखायेंगी
कभी तो छटेंगे बादल
और वो धुंध भी
और दिखेगा सब कुछ साफ साफ़/

फिर पूरे होंगे वो सारे सपने
और जाग जाऊँगी मैं
एक नई उमंग
एक नए सबेरे के साथ

लोधी डॉ. आशा ‘अदिति’
बैतूल (म. प्र.)

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