सन्नाटा (लघुकथा)

सन्नाटा (लघुकथा)
ऑफिस में गार्ड की नौकरी करने वाले राम बाबू को उदास बैठे देखकर मैंने पूछा- क्या हालचाल है रामबाबू? तबियत तो ठीक है? रामबाबू ने कहा- जी ,साहब।
मैंने फिर कहा- तो फिर इतने उदास और गुमसुम क्यों हो? बेटी को लेकर चिंतित हो क्या?
अभी सप्ताह भर पहले ही रामबाबू के घर में लक्ष्मी का आगमन हुआ था।एक गरीब आदमी के लिए बेटी भी एक चिंता का कारण होती है। पढ़ाना- लिखाना और शादी करना। इन सबके लिए पैसा जुटाना आसान तो नहीं होता। रामबाबू ने कहा- सही पकड़े हैं साहब।मैंने उसे ढाढ़स बँधाने की कोशिश की, तो उसने कहा- साहब मुझे पढ़ाने लिखाने और शादी की चिंता नहीं है। मैं तो दूसरी बात को लेकर चिंतित हूँ। मैंने पूछा- फिर ऐसा क्या है, जो उदास हो?
उसने रुँधे गले से कहा- साहब इज्ज़त की चिंता है। बिटिया को दरिंदों से कैसे बचाएँगे? अब तो ऐसा भी नहीं है कि बिटिया सयानी हो ,तभी फिक्र हो। आजकल हैवान छोटी – छोटी बच्चियों को भी नहीं छोड़ते।
रामबाबू की बात सुनकर मैं भी सकते में आ गया । सोचने लगा कि रामबाबू की बात में दम तो है।आए दिन देश में छोटी-छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार और उनकी हत्या की वारदातें होती रहती हैं । सोशल मीडिया तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कुछ घटनाओं पर तो हो- हल्ला करते हैं। सामाजिक संगठन कैंडल मार्च निकाल कर विरोध जताते हैं।पर कुछ घटनाओं पर सन्नाटा पसर जाता है। खुद को धर्म निरपेक्ष कहने वाले इतनी सेलेक्टिव एप्रोच क्यों रखते हैं? मैं इस उधेड़बुन में फँस गया।
उसने मुझे चुप देखकर कहा- साहब, गरीब आदमी की इज्जत ही उसकी पूँजी होती है।
डाॅ बिपिन पाण्डेय

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