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सनम मेरा मुझसे चुराता है मुझको।

pradeep kumar

pradeep kumar

गज़ल/गीतिका

August 27, 2016

रुलाता है मुझको हँसाता है मुझको।
सनम मेरा’ मुझसे चुराता है मुझको।।

जिसे हर कदम पर सँभाला था मैंने।
वही आज आँखें दिखाता है मुझको।।

उन्हे देखकर के यही लग रहा है।
कोई तो नजर से पिलाता है मुझको।।

कभी गम खुशी में कभी गम में खुशियाँ।
गगन से ही देकर नचाता है मुझको।।

मुझे जानकर ही गिराता रहा है।
दिखाने को फिर भी उठाता है मुझको।।

जहाँ की नजर से बचाने की खातिर।
नजर में कहीं वो छुपाता है मुझको।।

लगाकर गले से मुझे थपकियां दे।
मुहब्बत के आखर पढा़ता है मुझको।।

जिसे रोशनी से नवाजा है मैनें।
वही “दीप” अकसर जलाता है मुझको।।

प्रदीप कुमार “दीप”

Author
pradeep kumar
पुलिंदा झूठ का केवल नहीं लिखता मैं गजलों में। rnहजारों रंग ख्वाहिश के नहीं भरता मैं गजलों में।।
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