सदा रोशन रहे वो घर जहां माँ मुस्कुराती है ।

सदा रोशन रहे वो घर जहां माँ मुस्कुराती है ।

तृण तृण जोड़ कर वो नीड़ फौलादी बनाती है
खतरा भांप कर बच्चों को जां पर खेल जाती है
नहीं फिर हारती वो चोंच तलवारी चलाती है
नहीं चिड़िया वो होती सिर्फ वो भी माँ कहाती है

सदा रोशन रहे वो घर जहां माँ मुस्कुराती है ।

स्वयं से कर उन्हें आकाश में उड़ना सिखाती है
परों से गर्म रख डैनो में अपने वो छुपाती है
भर के चोंच में चुग्गा वो चूजों को चुंगाती है
सभी गुणधर्म माँ के वो जमाने को बताती है ।

सदा रोशन रहे वो घर जहां माँ मुस्कुराती है ।

जन्म दे वेदना सहकर सतत वो मुस्कुराती है
शिशु की एक किलकारी पे वारी वारी जाती है
समेटे है सकल देवत्व वो छोटे से आंचल में,
उसके सामने सब सृष्टि छोटी पड़ती जाती है

सदा रोशन रहे वो घर जहां माँ मुस्कुराती है ।

गुरु बन ज्ञान का अक्षर प्रथम माँ ही सिखाती है
देकर दण्ड माँ शिशु की सकल क्षमता बढाती है
कभी सोती नहीं खुद से वो बच्चों को सुलाती है
कभी कुछ गुनगुनाती है कभी लोरी सुनाती है ।

सदा रोशन रहे वो घर जहां माँ मुस्कुराती है ।

अनुराग दीक्षित

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