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सत्रह

Kokila Agarwal

Kokila Agarwal

मुक्तक

December 30, 2016

छ:छ: पांच सत्रह का एक दांव शकुनि का क्या बोल गया
विवश हुआ ब्रह्माण्ड लाज का घूंघट भी वो खोल गया
स्वयं प्रभु के रहते कैसे ,विध्वंस की रचना रची गई
युगो युगो तक धुला नहीं वो कलंक वक्त जो घोल गया।

Author
Kokila Agarwal
House wife, M. A , B. Ed., Fond of Reading & Writing
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