सत्य

सदा विजय हो सत्य की, हो असत्य की हार।
रहे तनिक भी भय नहीं, साहस जिसके द्वार।।

पाप तिमिर सब मिट गया, फैला सत्य प्रकाश।
आततायी प्रकृति का, करके समूल नाश।।

सत्य राह छोड़े नहीं, पड़े समय का फेर।
सत्य कभी छुपता नहीं, लगता थोड़ा देर।।

सत्य कर्म पर जो अडिग,रखता मन विश्वास।
वह जग में यश कीर्ति से, लिख जाता इतिहास।।

मौन सत्य का द्वार है, दीप्तिमान-सा भोर।
फेके जो लम्बी यहाँ, कर देता है बोर।।

रंग सत्य का एक है,झूठे रंग हज़ार।
तो फिर भाये क्यों नहीं ,झूठों का व्यापार।।

इस कलयुग में झूठ को, करते सब स्वीकार।
अब हर पल हर मोड़ पर,होता सत्य शिकार।।

सत्य बचा है नाम का,बहुत अधिक है झूठ।
धर्म-कर्म को त्याग कर,मनुज बना है ठूठ।।

-लक्ष्मी सिंह

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