सत्य

सत्य की खोज में
निकल आया था सागर के पार
जाने कितने पथ और मेरे पाँव
उन पर मिले झरनो की अविरल धार
मेरी चेतना में सिमटी हुई असंख्य झाँकीया
जो पदार्पण कर चुकी है निशा के इन पलो में,मेरे नयनो के समीप
अनन्त पर चलते-चलते
वृत्ति नहीं बदलती परन्तु मेरी
जीवन का हर पड़ाव यात्रा को पुकारता है
आभासो से चैतन्य सत्य को निहारता है
यही यात्रा का मंतव्य
जीवन का अटल सत्य है
यात्री तेरी यात्रा तो बस इतनी है
तेरे शरीर में श्वास जितनी है

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