कविता · Reading time: 1 minute

सत्य” नहीं “अर्धसत्य”

ये “सत्य” नहीं “अर्धसत्य” है…

बरसों से “कलम” भी बिकती है
“कलमकार” भी बिकता है…
तभी तो सरेबाज़ार
“विद्या की किताबें” बिकती हैं
सुबह-सुबह “अखबार” बिकता है…

दुनिया ज़रूर पलट कर पूछती
“पत्रकारों” का हाल
पर सच तो ये है…
कोठे की मुन्नीबाई की तरह
अब पत्रकार बिकता है…

Suneel Pushkarna

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