सच तुम रूठ जाओ तो , मनाने का मज़ा कुछ और है !

बातों बातों में ठुनकना !
होठों से निर्झरणी बहना !
भूकम्प के झटके से लगते
भरभरा चीजों का गिरना !
उस बिगड़े सन्तुलन का –
जब तब दिखता नहीं कोई ठौर है !

भाल की बिंदी बिदकना
और जुल्फों का बिखरना !
चूड़ियां ऊपर को चढ़ती
पल्लू का वो कमर कसना !
चिंगारियां आँखों में भड़के –
बस कब थमे, कब रुके यह दौर है !

हथेलियों का रगड़ खाना
मुठ्ठियों का बंध ही जाना !
तमतमाये गाल हों और
मुस्कराकर ख़म दिखाना !
इस वीरांगना के स्वागत में –
बस मुस्कराने का मज़ा कुछ और है !!

समर्पण मुझको है करना
कानों को है बन्द रखना !
घिरी है सावन बदरिया
भीगने से अब क्या डरना !
बिजलियाँ चमके तो चमके –
रिमझिम रिमझिम बूंदों का ही शोर है !!

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